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नज़्म
मस्ताना हाथ में हाथ दिए ये एक कगर पर बैठे थे
यूँ शाम हुई फिर रात हुई जब सैलानी घर लौट गए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या रेनी ख़ंदक़ रन्द बड़े क्या ब्रिज कंगूरा अनमोला
गढ़ कोट रहकला तोप क़िला क्या शीशा दारू और गोला
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ऐसे छोड़ के उट्ठे जैसे छुआ तो कर देगा कंगाल
स्याने बन कर बात बिगाड़ी ठीक पड़ी सादा सी चाल
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
रहेगी मेरे दिल में तेरी उल्फ़त कारगर कब तक
मुझे मसहूर रक्खेगा ये इश्क़-ए-बे-समर कब तक