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नज़्म
तेरी उजली सी बस्ती में भी शायद ऐसा होता है
तब कपट भरे मन हँसते हैं जब प्रेमी चुपके रोता है
श्री अमर अमृतसरी
नज़्म
मिरे क़ामत से अब क़ामत तुम्हारा कुछ फ़ुज़ूँ होगा
मिरा फ़र्दा मिरे दीरोज़ से भी ख़ुश नुमूं होगा
जौन एलिया
नज़्म
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा