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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
है अभी शहबाज़ की ग़ैरत पर कर्गस ख़ंदा-ज़न
''है वही सरमाया-दारी बंदा-ए-मोमिन का दीं''
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
कि अब शहरों में मार ओ अज़दर ओ कर्गस नहीं मिलते
कुतुब-ख़ानों में अफ़्क़ार-ओ-अक़ाएद जल्वा-फ़रमा हैं
सहर अंसारी
नज़्म
बुध के टूटे-फूटे बुत के सर पर बूढ़ा कर्गस
मुर्दों की मज्लिस में बैठा अपनी बिपता सुना रहा है
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगा
तुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल-गाहें
जिन के परतव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ से
तिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगा