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नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को
गुलज़ार
नज़्म
जिस के छू जाते ही मिस्ल-ए-नाज़नीन-ए-मह-जबीं
करवटों पर करवटें लेती है लैला-ए-ज़मीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
शे'रों में करवटें ये नहीं सोज़-ओ-साज़ की
लहरें हैं ये हुज़ूर की ज़ुल्फ़-ए-दराज़ की
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फ़ज़ा-ए-अस्पताल है कि रंग-ओ-बू की करवटें
तिरे जमाल-ए-लाला-गूँ की दास्ताँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
आ चुकी थी नींद सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँ
बहर-ओ-बर में करवटें लेने लगा अब क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
बहे जाते थे बैठे इश्क़ के ज़र्रीं सफ़ीने में
तमन्नाओं का तूफ़ाँ करवटें लेता था सीने में