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नज़्म
न देखो काश तुम वो ख़्वाब जो देखा किया हूँ मैं
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
जौन एलिया
नज़्म
तू हुसूल-ए-ज़र की ख़ातिर किस क़दर बेचैन है
कसब-ए-दौलत ज़िंदगी का तेरी नसबुलऐन है
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
दुखती हड्डियों की भी सुन लीजिए ज़रा
इस ख़ाना-ख़राब-ए-दिल की मान कर ही तो आप हुए हैं ख़ाना-ख़राब
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मेरे साए से डरो तुम मिरी क़ुर्बत से डरो
अपनी जुरअत की क़सम अब मेरी जुरअत से डरो
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
शकील बदायूनी
नज़्म
में क़सम खाता हूँ अपने नुत्क़ के ए'जाज़ की
तुम को बज़्म-ए-माह-ओ-अंजुम में बिठा सकता हूँ मैं