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नज़्म
इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयात
उन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रें
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अली अकबर नातिक़
नज़्म
दूर इक मेडक चीख़ रहा है, ख़तरों से आज़ाद हूँ मैं
इस से बढ़ कर ग़ारत-गर तूफ़ान नज़र से गुज़रे हैं