aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "katthaa"
हर बात की खोज तो ठीक नहीं तुम हम को कहानी कहने दोउस नार का नाम मक़ाम है क्या इस बात पे पर्दा रहने दोहम से भी तो सौदा मुमकिन है तुम से भी जफ़ा हो सकती हैये अपना बयाँ हो सकता है ये अपनी कथा हो हो सकती हैवो नार भी आख़िर पछताई किस काम का ऐसा पछताना?इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
पहले नाँव गणेश का, लीजिए सीस नवाएजा से कारज सिद्ध हों, सदा महूरत लाएबोल बचन आनंद के, प्रेम, पीत और चाहसुन लो यारो, ध्यान धर, महादेव का ब्याहजोगी जंगम से सुना, वो भी किया बयानऔर कथा में जो सुना, उस का भी परमाणसुनने वाले भी रहें हँसी ख़ुशी दिन रैनऔर पढ़ें जो याद कर, उन को भी सुख चैनऔर जिस ने इस ब्याह की, महिमा कही बनाएउस के भी हर हाल में, शिव-जी रहें सुहाएख़ुशी रहे दिन रात वो, कभी न हो दिल-गीरमहिमा उस की भी रहे जिस का नाम 'नज़ीर'
बूढ़ा पनवाड़ी उस के बालों में माँग है न्यारीआँखों में जीवन की बुझती अग्नी की चिंगारीनाम की इक हट्टी के अंदर बोसीदा अलमारीआगे पीतल के तख़्ते पर उस की दुनिया सारीपान कत्था सिगरेट तम्बाकू चूना लौंग सुपारी
आ मेरे अंदर आपवित्र महरान के पानीठंडे मीठे मटियाले पानीमटियाले जीवन रंग जलधो दे सारा क्रोध कपटशहरों की दिशाओं का सब छलयूँ सींच मुझे कर दे मेरी मिट्टी जल-थलतिरे तल की काली चिकनी मिट्टी सेमाथे पर तिलक लगाऊँहाथ जोड़ ङंङवत करूँओ मन के भेद से गहरेहौले हौले साँस खींचतेओम समान अमरओ महान सागरमैं उतरी तेरे ठंडे जल में कमर कमरतेरे ठंडे मीठे मेहरबान पानी से मुँह धो लूँऔर धो लूँ आँसूखारे आँसूतेरे मीठे पानी से धो लूँओ महान मटियाले सागर आसुन मिरी कथामैं बड़ी अभागन भाग मेराबेदर्द हाथ में रहा सदाटूटा मेरा मिट्टी से नाताकैसे टूटाइक आँधी बड़ी भयानक लाल चुड़ैलमुझे ले उड़ीउठा कर पटका उस ने कहाँ से कहाँतेरे चरनों में सीस झुकाती एक अकेली जानमेरे साथ मेरा कोई मीत नहींकोई रंग रूप कोई प्रीत नहींमिरी अन-गढ़ फीकी मुरझाती बोली में कोई संगीत नहींमिरी पीढ़ियों के बीते युग मेरे साथ नहींबस इक निर्दयी धरम हैजिस का भरम नहींवो धरम जो कहता है मिट्टी मिरी बैरन हैजो मुझे सिखाता है सागर मेरा दुश्मन हैहाँ दूर कहींआकाश की ऊँचाई से परेरहता है ख़ुदाइतना रूखामिट्टी से जोड़ नहीं जिस कासब नाते प्रीत और बैर के उस की कारन मैं कैसे जोड़ूँमैं मिट्टी मेरा जनम मिट्टीमैं मिट्टी को कैसे छोड़ूँओ मटियाले बलवान महा-सागरमैं उखड़ी धरती सेभगवान मिरा रस सूख गयाफिर भी सुनती हूँ अपने लहू में बीते समय की नर्म धमकवो समय जो मेरे जनम से पहले बीत गयामेरे कानों मेंइक शोर है झर-झर बहते नद्दी नालों काऔर कोई महक बड़ी बे-कल हैजो गूँज बनी मिरी छाती से टकराती हैओ महान सागरजीवन-रस देअपने तल में जल-पौदा बन कर जड़ लेने देसदा जिएओ महान सागर सिंधूतू सदा जिएऔर जिएँ तिरे पानी में फिसलती मछलियाँशांत सुखी यूँहीतिरे पानी में नाव खेतेतिरे बालक सदा जिएँओ पालन-हार हमारेधरती के रखवालेअन्न-दातातिरी धरतीनर्म रेतीली मेहरबान सिंध की धरतीसदा जिए
हमें एक दिन ख़त्म करना पड़ेगाहमारे दिलों में जो कुछ फ़ासला हैहमें धूप में ख़ूब चलना पड़ेगामोहब्बत का बस एक ही रास्ता हैहम इंसान हैं और इंसाँ रहेंगेजो हैवान हैं एक दिन तंग आ करचले जाएँगे अपने जंगल में वापसजहाँ वो रहेंगे वहीं लड़ मरेंगेजो बाक़ी बचेंगे वो शहरों में आ करघरों को जलाने की कोशिश करेंगेजवानों को खाने की कोशिश करेंगेवो कॉलेज से जाती हुई लड़कियों कोअंधेरे में लाने की कोशिश करेंगेहम इंसान हैं और इंसाँ की इज़्ज़तहमेशा बचाने की कोशिश करेंगेहमें कोई अश्लोक आता नहीं हैस्वामी का त्रिशूल भाता नहीं हैहमारी कवीता, हमारी कथा हैहमारी किताबें हमारा जथा हैअगर कोई दीमक हमारा असासामिटाने की आशा लिए आ रही हैवो ये जान ले कि हमारे दिलों मेंमोहब्बत की लौ जगमगाने लगी हैहमें अपने सीनों की सीढ़ी बना केकिसी रात अम्बर पे जाना पड़ेगादिए की जगह फूल रखने पड़ेंगेपरिंदों के हमराह गाना पड़ेगा
क्यों उस झनझेलू ने तुझ से कहा क्याये क्या तेरी आँखें भीग गईं क्योंउस ने तुझ से कहा क्या सातों आसमानों के मालिकइतने पतले दिल वाले मालिक हम भी रोज़ उस चेहरे की कथा सुनते हैंहम तो कड़ा कर लेते हैं जी ऐसे मौक़ों पर
ये कथा मिरी बीवीसुन के खिलखिला उठीऔर अपनी दिन बीतीख़ुद ही फिर शुरूअ' कर दीआज मेरी मासी नेफिर गिलास शीशे काचकना-चूर कर डालासिर्फ़ ये नहीं बल्किकपड़े धोने वाली नेसिल्क का वो दुपट्टाकल ही जो ख़रीदा थाबोर बोर कर डालामैं ने भी लगी-लिपटीकुछ बचा नहीं रक्खीजिस क़दर थीं सलवातेंबे-नुक़त सुना डालींअपनी अपनी दिन-बीतीदोनों जब भी कह चुकतेक़हक़हे लगाते थेयूँ हम अपनी ग़ुर्बत कीख़ुद हँसी उड़ाते थेवो सुकूँ जो ग़ुर्बत केउन दिनों में हासिल थावो सुकूँ नहीं मिलतावो जो घर कभी जिस मेंदिल हमारा लगता थाउस में दिल नहीं लगता
शाम का वक़्त किसी दोस्त के साथचाय ख़ाने में बिताओतब्सिरा गर्दिश-ए-दौराँ पे करोजाएज़ा वक़्त का लो और कथा अपनी सुनाओ
ऐ नुक्ता-वरान-ए-सुख़न-आरा-ओ-सुख़न-संजऐ नग़्मा-गिरान-ए-चमनिस्तान-ए-मआफ़ीमाना कि दिल-अफ़रोज़ है अफ़्साना-ए-अज़रामाना कि दिल-आवेज़ है सलमा की कहानीमाना कि अगर छेड़ हसीनों से चली जाएकट जाएगा इस मश्ग़ले में अहद-ए-जवानीगरमाएगा ये हमहमा अफ़्सुर्दा दिलों कोबढ़ जाएगी दरिया-ए-तबीअत की रवानीमाना कि हैं आप अपने ज़माने के 'नज़ीरी'माना कि हर इक आप में है उर्फ़ी-ए-सानीमाना की हदीस-ए-ख़त-ओ-रुख़्सार के आगेबेकार है मश्शाइयों की फ़ल्सफ़ा-दानीमाना कि यही ज़ुल्फ़ ओ ख़त-ओ-ख़ाल की रूदादहै माया-ए-गुल-कारी-ए-ऐवान-ए-मआफ़ीलेकिन कभी इस बात को भी आप ने सोचाये आप की तक़्वीम है सदियों की पुरानीमाशूक़ नए बज़्म नई रंग नया हैपैदा नए ख़ामे हुए हैं और नए 'मानी'मिज़्गाँ की सिनाँ के एवज़ अब सुनती है महफ़िलकाँटों की कथा बरहना-पाई की ज़बानीलज़्ज़त वो कहाँ लाल-ए-लब-ए-यार में है आजजो दे रही है पेट के भूखों की कहानीबदला है ज़माना तो बदलिए रविश अपनीजो क़ौम है बेदार ये है उस की निशानीऐ हम-नफ़सो याद रहे ख़ूब ये तुम कोबस्ती नई मशरिक़ में हमीं को है बसानी
तुम पतंग बन के हवाओं में तैरती फिरोऔर डोर मिरे हाथों को काटती रहेपर पर ज़ख़्मी और आँखें तेरे रंगों में उलझी रहेंलहू बहता रहेऔर आस तुझे चाहने कीआसमान बन के तिरे चारों तरफ़ बिखर जाएशाम उतरे तो तेरी आँखों का रंगमुझे अपनी पनाह में समेट लेऔर तेरी राहों पर मेरा इक इक लम्स बिखेर देतेरी राहों का कुछ पता तो होगाऔर तेरे वक़्त की कोई मंज़िल तो होगी जान(२)एक मैं तन्हा एक वो तन्हाएक वो जिस से मैं तुम्हारी कथा कहता हूँएक वो जो किसी की कथा से मुझ में ज़िंदाऔर तुम तन्हालो ये भी कोई बात हुई तुम ने कहाहाँ ये बातें और इन बातों के नुकीले कुंगरेजब तेरी जान में अटकते हैंतो तुम्हारे नाख़ुनों में ऐसी शफ़क़ दहकती हैजो सुन न सके कुछ कह न सकेतब मेरी उमंगों पर इक आग लहराती हैऔर मैं तुझे उन ख़ुद-रौ जंगली फूलों से तश्बीह देता हूँजो सिर्फ़ अपनी वहशत में ज़िंदा रहते हैं(३)ज़ख़्म खुल गए हैं जानाँऔर हवाएँ चारों तरफ़ से उमडी पड़ी हैं
हम किसी को न चाहते हुए भीकिसी से मंसूब हो जाते हैंसदियों की तवील जुदाईवो सुलगते दिल पर मुस्कुराते गुज़र जाती हैदिल का मोआमला अंधेरे में मश्कूक हो जाता हैकोहर-आलूद दिल में ये कौन धड़कता हैपत्थर के आदमी की तरह गुम-सुमजो अग्नी कथा सुना भी न सकेपीतल के नाख़ुन वाला ज़ालिमवो लोहे के हाथों वाला क़ातिल
मैं कोई ख़्वाब लिखूँ कहानी में बीती किसी रात काकहकशाओं की नगरी से गुज़रे हुएरात ओढ़े हुए इक हसीन साथ काइस गगन की कथा भी लिखूँजिस पे नैनों के झिलमिल दिए जगमगा उठे थेजिस पे बादल हमारी तरह खिलखिला उठे थेजिस पे कोहरे की चादर तले चाँद चुप-चाप थाऔर कहीं दूर मुरली पे बजता कोई साज़ थावो जो ख़्वाहिश सी बहती हुई कासनी नहर थीवो जो आँखों से कोसों परे अन-छूई सेहर थीहाँ वही हाँ वही हाँ वही क़हर थीमुझ को बाँहों में अपने छुपाए हुएबर्फ़ की सिलवटों से सरकते हुएधुँद ओढ़े हुएदूधिया रौशनी से परेचाँद की ओट मेंतेरे पहलू में सिमटी हुईरात ख़ामोश थीमैं भी मीरा के जैसी किसी कृष्ण की योगिनी थी मगरमैं भी निर्दोश थी
वो पत्थरों के क़बीले की रेशमी लड़कीरिवायतों की फ़सीलों में ख़ुद को क़ैद किएफ़रेब-ए-ज़ात की इक ख़ुशनुमा हवेली मेंअकेले-पन की कथा सुन रही थी फूलों सेऔर अपने आप को बहलाए थी परिंदों सेकि उस की रूह की वादी में इक हिरन-जज़्बाक़ुलांचें भरता हुआ खाइयों में दौड़ गयाये पत्थरों के क़बीले की शाहज़ादी भीहर ए'तिमाद की ज़ंजीर तोड़ कर निकलीतलाश करती हुई अपना वो हिरन-जज़्बादुखों की झील किनारे उदास आ बैठी
मैं ख़्वाजा-सराओं के शहर में पैदा हुआमैं अपनी तकमील का लगान किस किस को दूँमाँ आटा गूँध कर भूकी सो गईऔर मैं ने मिटी गूँध कर अपने लिए एक ख़ुदा बना लियासज्दा मेरी पेशानी का ज़ख़्म हैमगर मेरा मरहम सफ़र-ए-सुक़रात के प्याले में पड़ा हैख़ुदा का बोसा मेरा पहनावा थामुझे बे-लिबास कर के कटहा पहना दिया गयामेरी ज़बान ने जलते कोएले की गवाही चख़ीऔर मुंसिफ़ ने मेरी आवाज़ अपने तराज़ू से चुरा लीमैं क्या करूँ दीवारोंदीमक का रिज़्क़ बन जाऊँया चूहों को अपने बदन में बिल बना लेने दूँजो मेरी छटी हिस कतरता चाहते हैं
तुम ठिठुरती गुज़रती होई शाम की मद-भरी रौशनी सेचुराए हुए चार पल की कथासुन सको तो सुनोसादिक़ीन इक गली में खड़ा थानस्क़-ओ-तालीक़ की उलझनों में घिरी ज़िंदगीइक गलीजिस के चारों तरफ़हसरतों का खत-ए-नस्ख़फ़ीसा ग़ौरिस के मसअलों में उलझा हुआला-सई पढ़ रहा थासादक़ीनी फ़रासत रियाज़त की मंज़िल पे फ़ाएज़ इबादत का रस पी रही थीचाँद की गर्दिशें पूरी होने न पाई थीं उस रात भीजब उसे उस के फ़न नेख़ुदावंद से महव-ए-सुख़न देख करएक भर पूर ता'ज़ीमी सज्दा कियानुक़रई रौशनी उस के माथे से फूटी थी जिस ने गली को मोअ'त्तर कियानस्क़-ओ-तालीक़ की उलझनों में घिरी ज़िंदगी इक गलीजिस के दूजी तरफ़इल्म-ओ-इरफ़ान के शाख़ इम्कान के दाएरे बन चुके हाशिए लग चुके थेमगर वो इलाही-सिफ़त पेंट की बोतलें काग़ज़ों पर उंडेले हुएनक़्श-गर्दी में खोया रहाउसे इस से मतलब ही क्या था कि कौन उस के खींचे हुए इक सुलुस हाशिए तक पहुँचने की ख़ातिर मरे जा रहा हैमगर रात के इक पहरचाँद जब बादलों में छुपाअहरमन ने कहामेरा इक नक़्श भी बिकने वाला नहींतो अब ऐसा करो उस की हर क़ौस पर इस्म-ए-आज़म लिखो
ऐ मेरे बेटो!मैं सोचती हूँकि क़दमों सेमैं अपने तन के हयात-आगीं लहू के चश्मेबहा रही हूँतुम्हारे सारेनज़ार जिस्मों नहीफ़ ज़ेहनों की मुर्दनी कोमिटा रही हूँअज़ल से अपने ज़ईफ़ चेहरे की आड़ी-तिरछीसी झुर्रियों की लकीर में तोउदास आँखों मलूल पलकोंसे टपके क़तरेमिला रही हूँहसीन ख़्वाबों के बूढ़े बरगदके ज़र्द पत्ते भी चुन रही हूँवो ख़्वाब जिन केचमकते जुगनूअसीर करने को मेरी बाँहों के साहिलों परसफ़ेद चेहरे स्याह क़ालिबग़नीम उतरेहसीन ख़्वाबों के जुगनुओं कोअसीर कर केख़ुद अपनी माओं की सर्द आँखों को ज़िंदगी दीमिरे दफ़ीने मिरे ख़ज़ीनेसे अपनी कश्तीकी गोद भर भर के ले गए औरमेरे बेटों के ज़ेहन-ओ-दिल मेंतफ़ावुतों और अदावतों कीकरीह फ़सलों के बीज बोएवो फ़सलें जिन कोअज़ीज़ बेटों ने अपने अपने लहू से सींचाकि जिन के सीने की पाक मिट्टीको गर्म ताज़ा लहू सेहर दमग़लीज़ रक्खाऔर मेरे बेटो!मैं सोचती हूँइसी तरह गरतफ़ावुतों और अदावतों केये बीच बोतेरहे तो इक दिनये देखना तुमन तुम रहोगे न मैं रहूँगीफ़क़त हमारी कथा रहेगी!
इस इक लोक गाथा नेबचपन के वो दिनमुझे फिर दिलाए हैं यादकि जब मैं कई बारपापा कि गोदी में बैठीबड़ी आँख वालेभयानक बड़े अज़दहा की कथा सुन रही थीजिसे शाहज़ादे ने ही मार डाला था आख़िरये कुछ इस तरह लग रहा थाकि जैसे ये कल ही हुआ होभयंकर नज़र आने वाला बड़ा अज़दहा जबइधर शाहज़ादे को खाने को लपकातो मैं ने झट अपना चेहराछुपा डाला पापा के काँधों के बीचयही जान कर मेरे पापा बचा लेंगे मुझ कोअगर अज़दहे ने यही फ़ैसला कर लिया हो कि मेरा बदनशाहज़ादे से ज़ियादा लज़ीज़ ही तो होगाजो अब इस क़दर अपने पापा से दूरमिलूँ अज़दहा सेलड़ूँगी मैं उस से ज़रूरअपने पापा की गहरी मोहब्बत के बल परकि वो अज़दहा अब भी रहता हैतहज़ीब के मारे लोगों के बीचकि आख़िर मिरे पापा की लोक-गाथाओं ने हीदिखाया है मुझ कोकि अच्छाइयों ही की होती जीत इस जहाँ मेंचुनाँचे मुझे जिस क़दर अपने पापा पे पक्का यक़ीं हैउन की सब लोक-घाथाओं पर भी है उतना यक़ीं
और फिर कुछ यूँ हुआलफ़्ज़ की तकरार सेमुर्तइश इज़हार सेउक़्दा-ए-दुश्वार सेशाइ'री उक्ता गईशाइ'री की बे-कराँ मौज-ए-तख़य्युल यूँ उठीतंग-ना-ए-नज़्म-ओ-नग़्मा गुम हुईइम्तियाज़-ए-बहर-ओ-बर मिटता गयाएहतिमाम-ए-ज़ौक़-तर जाता रहाचश्मा-ए-वहम-ओ-गुमाँफूटता है वादी-ए-इज्ज़-ए-बयाँ के वस्त सेफैलती है ख़ीरगीलम्हा-ए-माकूस हैआब-जू-ए-ख़्वाब है पैहम रवाँझील सूरत हर्फ़ साकित हैं मगरझिलमिलाते हैं मआ'नी लफ़्ज़ के तालाब मेंबात गहरी है बहुतसाज़ भी ख़ामोश हैगुंजलक संजोग सेमौजिब-ए-ना-ग़ुफ़्तनीक़ाबिल-ए-इज़हार हैहाँ मगर वो शेरियतदूर इक लाया'नियत के बे-अमाँ पाताल मेंबरसर-ए-पैकार है
ऐ मिरी बे-दिली के शिकस्ता किनारोमिरे ख़्वाब-ए-हस्ती केमौहूम रेशम कोकिस धूप कीज़र्द दीमक ने चाटाकौन सी ख़्वाहिशों कीहरी टहनियों परबरहना हवाओं के पंजे पड़ेकिस तलब की कथाउन के रास्तों में कहीं राह-ए-गुम-कर्दा रहरव की सूरतख़जिल और कम-रख़्त रहने लगीमैं उदासी की गहरी सहेली हूँतीखी पहेली हूँऔर मेरी उलझन की सुलझन भी दुश्वार हैमैं युगों से किसी दर्द की ख़ुश-हुनर उँगलियों कीतुनुक-ताब पोरों सेअपना पता पूछती हूँबहुत कार-ए-उक़्दा-कुशाई कठिन हैमगर मैं किसी रंज-ए-बरसरख़याल-ए-जुनूँ-पेशा कीआरज़ू कर रही हूँये गुंजल सुलझ जाएइस धुन मेंदिल के नशेबों कोक्या क्या लहू कर रही हूँ
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