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नज़्म
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
लाहौर में देखा उसे मदफ़ूँ तह-ए-मर्क़द
गर्द-ए-कफ़-ए-पा जिस की कभी काहकशाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
नहीं मुमकिन मिटाना मुझ को मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा यारो
ख़लाओं में रहूँगा गूँजता बन कर सदा यारो
सदा अम्बालवी
नज़्म
हो न जाए राख जल कर ये दयार-ए-ख़ार-ओ-ख़स
डाल दे बिजली से ले कर उस के सीने में नफ़स
मैकश हैदराबादी
नज़्म
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
हिमायत अली शाएर
नज़्म
ख़ार-ओ-ख़स के झोंपड़े मिट्टी के बोसीदा मकाँ
जैसे अंधों के इशारे जैसे गूँगों की ज़बाँ
मयकश अकबराबादी
नज़्म
मैकश हैदराबादी
नज़्म
वहीद अख़्तर
नज़्म
सवाल अब ख़ार-ओ-ख़स या ग़ुंचा-ओ-गुल का नहीं हमदम
चली तेग़-ए-ख़िज़ाँ सारे चमन की आज़माइश है