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नज़्म
कि उस की एक आँख से चमगादड़ ने छलांग लगाई
और एक आँख से फ़ड़फ़ड़ाता हुआ ख़ार-ए-पुश्त निकला
रईस फ़रोग़
नज़्म
ठीक है कि पस-ए-पुश्त रखे हुए ख़ून-आलूद हाथ
मेरा रहबर ही था जो मोहब्बत का प्रचार करता रहा
मोहम्मद अहमद
नज़्म
और फिर धुँदली फ़ज़ाओं में तू खो जाती है
देखता हूँ जो मैं मुड़ कर कि पस-ए-पुश्त है कौन
पैग़ाम आफ़ाक़ी
नज़्म
पज़मुर्दा वो गुल दब के हुए ख़ाक के नीचे
ख़्वाबीदा हैं ख़ार-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक के नीचे
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!
मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हाँ मगर सुन ले तू ऐ हुस्न की मय से सरशार
ख़ार-ख़ार-ए-अलम-ए-हिज्र से हूँ सख़्त हज़ीं
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
कि शो'ला-ज़न है रग-ए-ख़ार-ओ-ख़स में ज़ौक़-ए-नुमू
न अब वो गर्दिश-ए-अफ़्लाक है न दर्द-ए-हयात
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
मुब्तला पेच में हैं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरह
दर पे लटके हैं बशर ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की तरह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
नर्म-रफ़्तारी हो वक़्त-ए-सैर-ए-गुलज़ार-ए-तरब
राह-ए-पुर-ख़ार-ए-अमल में गर्म-रफ़्तारी भी हो
अर्श मलसियानी
नज़्म
धुँद में डूबे हुए ख़ार ओ गुल ओ संग ओ ज़ुजाज अच्छे हैं
एक इबहाम में तहलील हुए जाते हैं मंज़र सारे