aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khafa"
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगीलोग बे-वज्ह उदासी का सबब पूछेंगेये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ होजगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ होउँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगेकाँपते हाथों पे भी फ़िक़रे कसे जाएँगेफिर कहेंगे कि हँसी में भी ख़फ़ा होती हैंअब तो 'रूही' की नमाज़ें भी क़ज़ा होती हैंलोग ज़ालिम हैं हर इक बात का तअना देंगेबातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगेइन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेनावर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगेचाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन सेमेरे बारे में कोई बात न करना उन सेबात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
आज के नामऔरआज के ग़म के नामआज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ाज़र्द पत्तों का बनज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस हैदर्द की अंजुमन जो मिरा देस हैक्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नामकिर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नामपोस्ट-मैनों के नामताँगे वालों का नामरेल-बानों के नामकार-ख़ानों के भूके जियालों के नामबादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़दहक़ाँ के नामजिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गएजिस की बेटी को डाकू उठा ले गएहाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली हैदूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली हैजिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तलेधज्जियाँ हो गई हैउन दुखी माओं के नामरात में जिन के बच्चे बिलकते हैं औरनींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहींदुख बताते नहींमिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन सेन जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुमवो शोख़ियाँ वो तबस्सुम वो क़हक़हे न रहेहर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुमछुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनीख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुममेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दोउमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहींमिरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करोग़म-ए-हयात ग़म-ए-यक-नफ़स है कुछ भी नहींतुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करोवफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहींमुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत होमिरी फ़ना मिरे एहसास का तक़ाज़ा हैमैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम कोमुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया हैयहाँ हयात के पर्दे में मौत पलती हैशिकस्त-ए-साज़ की आवाज़ रूह-ए-नग़्मा हैमुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहींमिरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुमये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँमगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुमख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब परतुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुममिरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगामगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहोहुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लियायहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तोमुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी कीमैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दोमैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगामगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकतामैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँमगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकतातुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझेनजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकताये ऊँचे ऊँचे मकानों की डेवढ़ियों के तलेहर एक गाम पे भूके भिकारीयों की सदाहर एक घर में है अफ़्लास और भूक का शोरहर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुकाये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस मेंहै दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्माये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलकये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशेये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोरये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द-रू बच्चेगली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरेहुसैन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुईये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँख़रीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिन कीये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्तये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरीये ग़म बहुत हैं मिरी ज़िंदगी मिटाने कोउदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंन कोई ख़ून का रिश्ता न कोई साथ सदियों कामगर एहसास अपनों सा वो अनजाने दिलाते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंख़फ़ा जब ज़िंदगी हो तो वो आ के थाम लेते हैंरुला देती है जब दुनिया तो आ कर मुस्कुराते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंअकेले रास्ते पे जब मैं खो जाऊँ तो मिलते हैंसफ़र मुश्किल हो कितना भी मगर वो साथ जाते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंनज़र के पास हों न हों मगर फिर भी तसल्ली हैवही मेहमान ख़्वाबों के जो दिल के पास रहते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंमुझे मसरूर करते हैं वो लम्हे आज भी 'इरफ़ान'कि जिन में दोस्तों के साथ के पल याद आते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
बैठा है मेरे सामने वोजाने किसी सोच में पड़ा हैअच्छी आँखें मिली हैं उस कोवहशत करना भी आ गया हैबिछ जाऊँ मैं उस के रास्ते मेंफिर भी क्या इस से फ़ाएदा हैहम दोनों ही ये तो जानते हैंवो मेरे लिए नहीं बना हैमेरे लिए उस के हाथ काफ़ीउस के लिए सारा फ़ल्सफ़ा हैमेरी नज़रों से है परेशाँख़ुद अपनी कशिश से ही ख़फ़ा हैसब बात समझ रहा है लेकिनगुम-सुम सा मुझ को देखता हैजैसे मेले में कोई बच्चाअपनी माँ से बिछड़ गया हैउस के सीने में छुप के रोऊँमेरा दिल तो ये चाहता हैकैसा ख़ुश-रंग फूल है वोजो उस के लबों पे खिल रहा हैया रब वो मुझे कभी न भूलेमेरी तुझ से यही दुआ है
रुकी रुकी सी सफ़ें मल्गजी घटाओं कीउतार पर है सर-ए-सहन रक़्स पीपल कावो कुछ नहीं है अब इक जुम्बिश-ए-ख़फ़ी के सिवाख़ुद अपनी कैफ़ियत-ए-नील-गूँ में हर लहज़ाये शाम डूबती जाती है छुपती जाती हैहिजाब-ए-वक़्त सिरे से है बेहिस-ओ-हरकतरुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्तये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहींबस एक वक़्फ़ा-ए-तारीक, लम्हा-ए-शहलासमा में जुम्बिश-ए-मुबहम सी कुछ हुई फ़ौरनतुली घटा के तले भीगे भीगे पत्तों सेहरी हरी कई चिंगारियाँ सी फूट पड़ींकि जैसे खुलती झपकती हों बे-शुमार आँखेंअजब ये आँख-मिचोली थी नूर-ओ-ज़ुल्मत कीसुहानी नर्म लवें देते अन-गिनत जुगनूघनी सियाह ख़ुनुक पत्तियों के झुरमुट सेमिसाल-ए-चादर-ए-शब-ताब जगमगाने लगेकि थरथराते हुए आँसुओं से साग़र-ए-शामछलक छलक पड़े जैसे बग़ैर सान गुमानबुतून-ए-शाम में इन ज़िंदा क़ुमक़ुमों की दमककिसी की सोई हुई याद को जगाती थीवो बे-पनाह घटा वो भरी भरी बरसातवो सीन देख के आँखें मिरी भर आती थींमिरी हयात ने देखी हैं बीस बरसातेंमिरे जनम ही के दिन मर गई थी माँ मेरीवो माँ कि शक्ल भी जिस माँ की मैं न देख सकाजो आँख भर के मुझे देख भी सकी न वो माँमैं वो पिसर हूँ जो समझा नहीं कि माँ क्या हैमुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला थावो मुझ से कहती थीं जब घिर के आती थी बरसातजब आसमान में हर सू घटाएँ छाती थींब-वक़्त-ए-शाम जब उड़ते थे हर तरफ़ जुगनूदिए दिखाते हैं ये भूली-भटकी रूहों कोमज़ा भी आता था मुझ को कुछ उन की बातों मेंमैं उन की बातों में रह रह के खो भी जाता थापर इस के साथ ही दिल में कसक सी होती थीकभी कभी ये कसक हूक बन के उठती थीयतीम दिल को मिरे ये ख़याल होता था!ये शाम मुझ को बना देती काश इक जुगनूतो माँ की भटकी हुई रूह को दिखाता राहकहाँ कहाँ वो बिचारी भटक रही होगीकहाँ कहाँ मिरी ख़ातिर भटक रही होगीये सोच कर मिरी हालत अजीब हो जातीपलक की ओट में जुगनू चमकने लगते थेकभी कभी तो मिरी हिचकियाँ सी बंध जातींकि माँ के पास किसी तरह मैं पहुँच जाऊँऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ अपने खिलौने दिखाऊँ अपनी किताबकहूँ कि पढ़ के सुना तो मिरी किताब मुझेफिर इस के ब'अद दिखाऊँ उसे मैं वो कापीकि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस मेंये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहलऔर उस को राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊँदिखाऊँ फिर उसे आँगन में वो गुलाब की बेलसुना है जिस को उसी ने कभी लगाया थाये जब कि बात है जब मेरी उम्र ही क्या थीनज़र से गुज़री थीं कल चार पाँच बरसातें
क्या हुआ गर मिरे यारों की ज़बानें चुप हैंमेरे शाहिद मिरे यारों के सिवा और भी हैंअहल-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैंएक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैंहम पे ही ख़त्म नहीं मस्लक-ए-शोरीदा-सिरीचाक-दिल और भी हैं चाक-क़बा और भी हैं
हुए यसरिब की सम्त जब राहीसय्यद-ए-अबतही के हमराहीरिश्ते उल्फ़त के सारे तोड़ चलेऔर बिल्कुल वतन को छोड़ चलेगो वतन से चले थे हो के ख़फ़ापर वतन में था सब का जी अटकादिल-लगी के बहुत मिले सामानपर न भूले वतन के रेगिस्तानदिल में आठों पहर खटकते थेसंग-रेज़े ज़मीन-ए-बतहा केघर जफ़ाओं से जिन की छूटा थादिल से रिश्ता न उन का टूटा था
गली में जाती होजाते ही लौट आती होकहीं की चीज़कहीं रख के भूल जाती होकिचन में!रोज़ कोई प्याली तोड़ देती होमसाला पीस करसिल यूँही छोड़ देती होनसीहतों से ख़फ़ामश्वरों से उलझन सीकमर में दर्द की लहरेंरगों में एैंठन सी
अभी इक साल गुज़रा है यही मौसम यही दिन थेमगर मैं अपने कमरे में बहुत अफ़्सुर्दा बैठा थान कोई साँवले महबूब की यादों का अफ़्सानान ऐवान-ए-ज़मिस्ताँ की तरफ़ जाने की कुछ ख़्वाहिशकिसी ने हाल पूछा तो बहुत ही बे-नियाज़ी सेकहा जी हाँ ख़ुदा का शुक्र है मैं ख़ैरियत से हूँकोई ये पूछता क्यूँ आज कल कोई ग़ज़ल लिक्खीन जाने बात क्या है इन दिनों कुछ ऐसा लगता हैतुम्हारी हर ग़ज़ल में मीर का अंदाज़ मिलता हैहर इक मिसरे से जैसे धीमी धीमी आँच उठती हैतुम्हारे शेर पढ़ कर जाने क्यूँ महसूस होता हैकि कोई साज़ पर मद्धम सुरों में गुनगुनाता हैमगर इक बात पूछूँ तुम ख़फ़ा तो हो न जाओगेये आख़िर क्या सबब है आज कल नज़्में नहीं लिखतेतुम्हारी आप-बीती भी अभी तक ना-मुकम्मल हैइसे तो नाक़िदान-ए-फ़न ने सुनते ही सराहा हैमैं सब सुनता मगर ये दिल ही दिल में सोचता रहतामिरे अहबाब क्या जानें कि मुझ पर क्या गुज़रती हैमिरे अफ़्कार पे ये कैसी वीरानी सी छाई हैबहुत कुछ सोचता हूँ फिर भी अब सोचा नहीं जाताबहुत कुछ चाहता हूँ फिर भी कोई बस नहीं चलतामगर इस बेबसी में भी मिरे दिल की ये हालत थीकभी जब कोई अच्छी चीज़ पढ़ने के लिए मिलतीतो पहरों रूह पर इक वज्द की सी कैफ़ियत होतीरगों में मेरी जैसे ख़ूँ की गर्दिश तेज़ हो जातीलहू का एक इक क़तरा ये कहता मैं तो ज़िंदा हूँमिरी पामालियों में पल रही है इक तवानाईयही आलम रहा तो जाने मैं किस रोज़ उठ बैठूँबसंत आया तो यूँ आया कि मैं भी जैसे उठ बैठासवेरा होते ही हर सम्त से झोंके हवाओं केनई ख़ुश्बू लिए मुझ को जगाने के लिए आएजिधर भी आँख उठाता हूँ शफ़क़ की मुस्कुराहट हैवही सूरज है लेकिन और ही कुछ जगमगाहट हैन जाने कैसे कैसे फूल अब मुझ को बुलाते हैंन जाने कितने कितने रंग से दिल को लुभाते हैंफ़ज़ा में दूर तक फैले हुए वो खेत सरसों केये कहते हैं कि अब अरमाँ निकालो अपने बरसों केतुम्हारे सामने फैला हुआ मैदान सारा हैकोई आवाज़ देता है कि आओ तुम हमारे होमिरी धरती के बेटे मेरी दुनिया के दुलारे होतुम्हारी आँख में जो ख़्वाब सोए हैं वो मेरे हैंतुम्हारे अश्क ने जो बीज बोए हैं वो मेरे हैंइसी वादी में फिर से लौट कर अब तुम को आना हैतुम्हारी ही ये बस्ती है तुम्हीं को फिर बसाना हैअब इस बस्ती में रखते ही क़दम कुछ ऐसा लगता हैकि इस का ज़र्रा ज़र्रा पत्ता पत्ता कुछ नया सा हैहर इक रस्ते पे जैसे कुछ नए चेहरे से मिलते हैंयही जी चाहता है जो मिले अब उस से ये पूछेंतुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ के रहने वाले होकुछ ऐसा जान पड़ता है कि पहले भी मिले हैं हमरहे हैं साथ या इक दूसरे को जानते हैं हमअगर तुम साथ थे तो तुम भी शायद दोस्त थे मेरेमुझे याद आया दोनों साथ ही कॉलेज में पढ़ते थेवो सारे दोस्तों का जम्अ होना मेरे कमरे मेंवो गप शप क़हक़हे वो अपने अपने इश्क़ के क़िस्सेवो मीरास रोड की बातें वो चर्चे ख़ूब-रूयों केकभी आवारागर्दी अपनी उन वीरान सड़कों कीकभी बातों में रातें काटना सुनसान जाड़ों कीकभी वो चाँदनी में अपना यूँ ही घूमते रहनाकभी वो चाय की मेज़ों पे घंटों बैठना सब कावो बातें इल्म-ओ-हिकमत की कभी शिकवे-शिकायत कीतुम्हें तो याद होगा उन में ही इक दोस्त शाइर थाज़रा देखो तो मुझ को ग़ौर से शायद वो मैं ही थाबहुत दिन में मिले हैं हम तो आओ आज जी भर करहँसें बोलें कहीं आवारागर्दी के लिए निकलेंचलें और चल के सारे दोस्तों को फिर बुला लाएँसजाएँ आज फिर महफ़िल कहीं पीने पिलाने कीमैं तुम को आज अपनी कुछ नई बातें बताऊँगामैं तुम को आज अपनी कुछ नई नज़्में सुनाऊँगा
किन ख़यालात में यूँ रहती हो खोई खोईचाय का पानी पतीली में उबल जाता हैराख को हाथ लगाती हो तो जल जाता हैएक भी काम सलीक़े से नहीं हो पाताएक भी बात मोहब्बत से नहीं कहती होअपनी हर एक सहेली से ख़फ़ा रहती होरात भर नाविलें पढ़ती हो न जाने किस कीएक जंपर नहीं सी पाई हो कितने दिन सेभाई का हाथ भी ग़ुस्से से झटक देती होमेज़ पर यूँ ही किताबों को पटक देती होकिन ख़यालात में यूँ रहती हो खोई खोई
तमतमाए हुए आरिज़ पे ये अश्कों की क़तारमुझ से इस दर्जा ख़फ़ा आप से इतनी बेज़ारमैं ने कब तेरी मोहब्बत से किया है इंकार
बेज़ार फ़ज़ा दरपा-ए-आज़ार सबा हैयूँ है कि हर इक हमदम-ए-देरीना ख़फ़ा हैहाँ बादा-कशो आया है अब रंग पे मौसमअब सैर के क़ाबिल रविश-ए-आब-ओ-हवा हैउमडी है हर इक सम्त से इल्ज़ाम की बरसातछाई हुई हर दाँग मलामत की घटा हैवो चीज़ भरी है कि सुलगती है सुराहीहर कासा-ए-मय ज़हर-ए-हलाहल से सिवा हैहाँ जाम उठाओ कि ब-याद-ए-लब-ए-शीरींये ज़हर तो यारों ने कई बार पिया हैइस जज़्बा-ए-दिल की न सज़ा है न जज़ा हैमक़्सूद-ए-रह-ए-शौक़ वफ़ा है न जफ़ा हैएहसास-ए-ग़म-ए-दिल जो ग़म-ए-दिल का सिला हैउस हुस्न का एहसास है जो तेरी अता हैहर सुब्ह-ए-गुलिस्ताँ है तिरा रू-ए-बहारींहर फूल तिरी याद का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हैहर भीगी हुई रात तिरी ज़ुल्फ़ की शबनमढलता हुआ सूरज तिरे होंटों की फ़ज़ा हैहर राह पहुँचती है तिरी चाह के दर तकहर हर्फ़-ए-तमन्ना तिरे क़दमों की सदा हैताज़ीर-ए-सियासत है न ग़ैरों की ख़ता हैवो ज़ुल्म जो हम ने दिल-ए-वहशी पे किया हैजिंदान-ए-रह-ए-यार में पाबंद हुए हमज़ंजीर-ब-कफ़ है न कोई बंद-ए-बपा है''मजबूरी ओ दावा-ए-गिरफ़्तारी-ए-उलफ़तदस्त-ए-तह-ए-संग-आमदा पैमान-ए-वफ़ा है''
अपने टीचर को नचाएँ तो मज़ा आ जाएउन की ऐनक को चुराएँ तो मज़ा आ जाएउन के डंडे को छुपाएँ तो मज़ा आ जाएआज जी भर के सताएँ तो मज़ा आ जाएकौन सा दिन है जो टीचर ने नहीं मारा हैहम ने हर काम किया फिर भी तो फटकारा हैउन का ग़ुस्सा है कि दहका हुआ अँगारा हैआग में आग लगाएँ तो मज़ा आ जाएमुँह पे चाँटे भी दिए हम ने बनाया मुर्ग़ाहम ने स्कूल से हर रोज़ ये तमग़ा पायाकितने जल्लाद हैं टीचर अरे अल्लाह अल्लाहहम भी मुँह उन का चढ़ाएँ तो मज़ा आ जाएवो पढ़ाते हैं तो औसान ख़ता होते हैंहक़ पढ़ाई के ये दुश्वार अदा होते हैंहम अगर रोते हैं फिर और ख़फ़ा होते हैंआज उन को भी रुलाएँ तो मज़ा आ जाएउन की कुर्सी पे चलो आओ पटाख़े बाँधेंजब वो आएँ तो पटाख़ों का तड़पना देखेंहम भी शागिर्द-ए-सितम-गार हैं इतना मानेंपीछे पीछे ही भगाएँ तो मज़ा आ जाएउन की जो चीज़ है चुपके से छुपा दें आओपान बीड़ी की जो डिबिया है उड़ा दें आओहम शरारत के नए जाल बिछा दें आओवो किसी जाल में आएँ तो मज़ा आ जाएवो अगर सामने आ जाएँ तो मिल कर चीख़ेंवो कहें चुप रहो हम और भी हँस कर चीख़ेंऔर वो आँखे दिखाएँ तो अकड़ कर चीख़ेंउन को दीवाना बनाएँ तो मज़ा आ जाए
रहबरों से शिकवा हैशौक़ से ख़फ़ा होतेहाँ मगर तग़ाफ़ुल मेंजुरअत-आज़मा होते
क़ाबिल-ए-इज़्ज़त हैं इस दुनिया के मेहनत-कश अवाममुल्क की दौलत हैं ये, वाजिब है इन का एहतिरामउस के ये मेम्बर हैं लेबर-यूनीयन है जिस का नामइन की मेहनत के दिए जाएँगे इन को पूरे दामये नहीं होगा ख़फ़ा हो कर दिहाड़ी काट दीआधे रस्ते लाए और इंजन से गाड़ी काट दी
वो नादान गुड़िया ख़फ़ा हो गईवो रोई वो चिल्लाई और सो गई
सिगरेट के रक़्स करते धुएँ से मिल कर,अजीब माहौल कर दिया हैऔर इस पे अब ये घड़ी की टिक-टिक ने,दिल उदासी से भर दिया हैकिसी ज़माने में हम ने,'नासिर', 'फ़राज़', 'मोहसिन', 'जमाल', 'सरवत' के शेर अपनी चहकती दीवार पर लिखे थेअब इस में सीलन क्यूँ आ गई है....?हमारा बिस्तर कि जिस में कोई शिकन नहीं है, उसी पे कब से,(वो दाएँ जानिब, मैं बाएँ जानिब....)न जाने कब से दराज़ हैं हम...!!!मैं उस से शायद ख़फ़ा नहीं हूँ,उसे भी कोई गिला नहीं हैमगर हमारी ख़मीदा पुश्तें जो पिछली कितनी ही साअतों सेबस एक दूजे को तक रही हैं....वो थक गई है
सारे टीचर्स भी रहते हैं ब-हर-हाल ख़फ़ामैं किसी वक़्त उन्हें ख़ुश ही नहीं कर पाता
सुनते हो इक बार वहाँ फिर हो आओएक बार फिर उस की चौखट पर जाओदरवाज़े पर धीरे धीरे दस्तक दोजब वो सामने आए तो प्रणाम करोमैं कुछ भूल गया हूँ शायद उस से कहोक्या भूला हूँ याद नहीं आता कह दोउस से पूछो ''क्या तुम बतला सकती हो''वो हँस दे तो कह दो जो कहना चाहोऔर ख़फ़ा हो जाए तो आगे मत सोचो
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