aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khal"
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँन मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या हैबसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों कोसमझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है
जो रुक सके तो रोक दो ये सैल रंग-ओ-नूर कामिरी नज़र को चाहिए वही चराग़ दूर काखटक रही है हर किरन नज़र में ख़ार की तरहछुपा दिया है ताबिशों ने आइना शुऊर कानिगाह-ए-शौक़ जल उठी हिजाब ढूँढता हूँ मैंजिन्हें सहर निगल गई वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैंकहाँ गई वो नींद की शराब ढूँढता हूँ मैं
चलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों कातलब सूखे हुए पत्तों का बे-रौनक़ जज़ीरा हैख़लिश दीमक-ज़दा औराक़ पर बोसीदा सतरों का ज़ख़ीरा हैख़ुम्मार-ए-वस्ल तपती धूप के सीने पे उड़ते बादलों की राएगाँ बख़्शिश!ग़ुबार-ए-हिज्र-ए-सहरा में सराबों से अटे मौसम का ख़म्याज़ाचलो छोड़ोकि अब तक मैं अँधेरों की धमक में साँस की ज़र्बों पेचाहत की बिना रख कर सफ़र करता रहा हूँगामुझे एहसास ही कब थाकि तुम भी मौसमों के साथ अपने पैरहन के रंग बदलोगीचलो छोड़ोवो सारे ख़्वाब कच्ची भरभरी मिट्टी के बे-क़ीमत घरौंदे थेवो सारे ज़ाइक़े मेरी ज़बाँ पर ज़ख़्म बन कर जम गए होंगेतुम्हारी उँगलियों की नरम पोरें पत्थरों पर नाम लिखती थीं मिरा लेकिनतुम्हारी उँगलियाँ तो आदतन ये जुर्म करती थींचलो छोड़ोसफ़र में अजनबी लोगों से ऐसे हादसे सरज़द हुआ करते हैं सदियों सेचलो छोड़ोमिरा होना न होना इक बराबर हैतुम अपने ख़ाल-ओ-ख़द को आईने में फिर निखरने दोतुम अपनी आँख की बस्ती में फिर से इक नया मौसम उतरने दोमिरे ख़्वाबों को मरने दोनई तस्वीर देखोफिर नया मक्तूब लिखोफिर नए मौसम नए लफ़्ज़ों से अपना सिलसिला जोड़ोमिरे माज़ी की चाहत राएगाँ समझोमिरी यादों से कच्चे राब्ते तोड़ोचलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों का
तिरा ख़याल है ख़ुशबू तिरा लिबास किरनतू ख़ाक-ज़ाद है या आसमाँ से उतरी हैमैं तुझ को देख के ख़ुद से सवाल करता हूँये मौज-ए-रंग ज़मीं पर कहाँ से उतरी है
तुम्हें क्याज़िंदगी जैसी भी हैतुम ने उस के हर अदा से रंग की मौजें निचोड़ी हैंतुम्हें तो टूट कर चाहा गया चेहरों के मेले मेंमोहब्बत की शफ़क़ बरसी तुम्हारे ख़ाल-ओ-ख़द परआइने चमके तुम्हारी दीद सेख़ुश्बू तुम्हारे पैरहन की हर शिकन सेइज़्न ले कर हर तरफ़ वहशत लुटाती थीतुम्हारे चाहने वालों के झुरमुट मेंसभी आँखें तुम्हारे आरिज़-ओ-लब की कनीज़ें थींतुम्हें क्यातुम ने हर मौसम की शह-ए-रग में उंडेले ज़ाइक़े अपनेतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि चेहरों से अटी दुनिया में तन्हा साँस लेतीहाँफती रातों के बे-घर हम-सफ़रकितनी मशक़्क़त से गरेबान-ए-सहर के चाक सीते हैंतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि तन्हाई के जंगल मेंसियह लम्हों की चुभती किर्चियों से कौन खेला हैतुम्हें क्यातुम ने कब सोचाकि चेहरों से अटी दुनिया मेंकिस का दिल अकेला है
जहाँ-ज़ाद कैसे हज़ारों बरस बादइक शहर-ए-मदफ़ून की हर गली मेंमेरे जाम ओ मीना ओ गुल-दाँ के रेज़े मिले हैंकि जैसे वो इस शहर-ए-बर्बाद का हाफ़िज़ा होंहसन नाम का इक जवाँ कूज़ा-गर इक नए शहर मेंअपने कूज़े बनाता हुआ इश्क़ करता हुआअपने माज़ी के तारों में हम से पिरोया गया हैहमीं में कि जैसे हमीं हों समोया गया हैकि हम तुम वो बारिश के क़तरे थे जो रात भर सेहज़ारों बरस रेंगती रात भरइक दरीचे के शीशों पे गिरते हुए साँप लहरेंबनाते रहे हैंऔर अब इस जगह वक़्त की सुब्ह होने से पहलेये हम और ये नौजवाँ कूज़ा-गरएक रूया में फिर से पिरोए गए हैंजहाँ-ज़ादये कैसा कोहना-परस्तों का अम्बोहकूज़ों की लाशों में उतरा हैदेखोये वो लोग हैं जिन की आँखेंकभी जाम ओ मीना की लिम तक न पहुँचींयही आज इस रंग ओ रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँको फिर से उलटने पलटने लगे हैंये उन के तले ग़म की चिंगारियाँ पा सकेंगेजो तारीख़ को खा गई थींवो तूफ़ान वो आँधियाँ पा सकेंगेजो हर चीख़ को खा गई थींउन्हें क्या ख़बर किस धनक से मेरे रंग आएमेरे और इस नौजवाँ कूज़ा-गर केउन्हें क्या ख़बर कौन सी तितलियों के परों सेउन्हें क्या ख़बर कौन से हुस्न सेकौन सी ज़ात से किस ख़द्द-ओ-ख़ाल सेमैं ने कूजों के चेहरे उतारेये सब लोग अपने असीरों में हैंज़माना जहाँ-ज़ाद अफ़्सूँ-ज़दा बुर्ज हैऔर ये लोग उस के असीरों में हैंजवाँ कूज़ा-गर हँस रहा हैये मासूम वहशी कि अपने ही क़ामत से ज़ोलीदा-दामनहैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा केउन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे थाजिस ने मुझ से और उस कूज़ा-गर से कहाऐ हसन कूज़ा-गर जागदर्द-ए-रिसालत का रोज़-ए-बशारत तिरे जाम ओ मीनाकी तिश्ना-लबी तक पहुँचने लगा हैयही वो निदा के पीछे हसन नाम काये जवाँ कूज़ा-गर भीप्यापे रवाँ है ज़माँ से ज़माँ तकख़िज़ाँ से ख़िज़ाँ तक
दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बमचादर शब-ए-नुजूम की शबनम का रख़्त-ए-नमतितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रममोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़मइन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तूकितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू
रणभूमी में लड़ते लड़ते मैं ने कितने सालइक दिन जल में छाया देखी चट्टे हो गए बालपापड़ जैसी हुईं हड्डियाँ जलने लगे हैं दाँतजगह जगह झुर्रियों से भर गई सारे तन की खाल
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
उस का चेहरा, उस के ख़द्द-ओ-ख़ाल याद आते नहींइक शबिस्ताँ याद हैइक बरहना जिस्म आतिश-दाँ के पासफ़र्श पर क़ालीन, क़ालीनों पे सेजधात और पत्थर के बुतगोश-ए-दीवार में हँसते हुए!और आतिश-दाँ में अँगारों का शोरउन बुतों की बे-हिसी पर ख़शम-गींउजली उजली ऊँची दीवारों पे अक्सउन फ़रंगी हाकिमों की यादगारजिन की तलवारों ने रक्खा था यहाँसंग-ए-बुनियाद-ए-फ़रंग!
शहर-ए-तमन्ना के मरकज़ में लगा हुआ है मेला साखेल-खिलौनों का हर-सू है इक रंगीं गुलज़ार खिलावो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिलामेले की सज-धज में खो कर बाप की उँगली छोड़ गयाहोश आया तो ख़ुद को तन्हा पा के बहुत हैरान हुआभीड़ में राह मिली नहीं घर की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम ने कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
मैं जिस्म ओ जाँ के तमाम रिश्तों से चाहता हूँनहीं समझता कि ऐसा क्यूँ हैन ख़ाल-ओ-ख़द का जमाल उस में न ज़िंदगी का कमाल कोईजो कोई उस में हुनर भी होगातो मुझ को इस की ख़बर नहीं हैन जाने फिर क्यूँ!मैं वक़्त के दाएरों से बाहर किसी तसव्वुर में उड़ रहा हूँख़याल में ख़्वाब ओ ख़ल्वत-ए-ज़ात ओ जल्वत-ए-बज़्म में शब ओ रोज़मिरा लहू अपनी गर्दिशों में उसी की तस्बीह पढ़ रहा हैजो मेरी चाहत से बे-ख़बर हैकभी कभी वो नज़र चुरा कर क़रीब से मेरे यूँ भी गुज़राकि जैसे वो बा-ख़बर हैमेरी मोहब्बतों सेदिल ओ नज़र की हिकायतें सुन रखी हैं उस नेमिरी ही सूरतवो वक़्त के दाएरों से बाहर किसी तसव्वुर में उड़ रहा हैख़याल में ख़्वाब ओ ख़ल्वत-ए-ज़ात ओ जल्वत-ए-बज़्म में शब ओ रोज़वो जिस्म ओ जाँ के तमाम रिश्तों से चाहता हैमगर नहीं जानता ये वो भीकि ऐसा क्यूँ हैमैं सोचता हूँ वो सोचता हैकभी मिले हम तो आईनों के तमाम बातिन अयाँ करेंगेहक़ीक़तों का सफ़र करेंगे
इस बार वो मिला तो अजब उस का रंग थाअल्फ़ाज़ में तरंग न लहजा दबंग थाइक सोच थी कि बिखरी हुई ख़ाल-ओ-ख़त में थीइक दर्द था कि जिस का शहीद अंग अंग थाइक आग थी कि राख में पोशीदा थी कहींइक जिस्म था कि रूह से मसरूफ़-ए-जंग था
मैं अक्सर सोचता हूँज़ेहन की तारीक गलियों मेंदहकता और पिघलताधीरे धीरे आगे बढ़ताग़म का ये लावाअगर चाहूँतो रुक सकता हैमेरे दिल की कच्ची खाल पर रक्खा ये अँगाराअगर चाहूँतो बुझ सकता हैलेकिनफिर ख़याल आता हैमेरे सारे रिश्तों मेंपड़ी सारी दराड़ों सेगुज़र के आने वाली बर्फ़ से ठंडी हवाऔर मेरी हर पहचान पर सर्दी का ये मौसमकहीं ऐसा न होइस जिस्म को इस रूह को ही मुंजमिद कर देमैं अक्सर सोचता हूँज़ेहन की तारीक गलियों मेंदहकता और पिघलताधीरे धीरे आगे बढ़ताग़म का ये लावाअज़िय्यत हैमगर फिर भी ग़नीमत हैइसी से रूह में गर्मीबदन में ये हरारत हैये ग़म मेरी ज़रूरत हैमैं अपने ग़म से ज़िंदा हूँ
मेरे ख़्वाबों के शबिस्ताँ में उजाला न करोकि बहुत दूर सवेरा नज़र आता है मुझेछप गए हैं मिरी नज़रों से ख़द-ओ-ख़ाल-ए-हयातहर तरफ़ अब्र घनेरा नज़र आता है मुझेचाँद तारे तो कहाँ अब कोई जुगनू भी नहींकितना शफ़्फ़ाफ़ अँधेरा नज़र आता है मुझे
ग़ुंचा-ए-दिल मर्द का रोज़-ए-अज़ल जब खुल चुकाजिस क़दर तक़दीर में लिक्खा हुआ था मिल चुका
रगों में अब ''मेरी तेरा लहू हैमिरी सूरत भी तुझ सी हू-ब-हू हैबहुत अर्से से ख़ुद में मैं हूँ ग़ाएबसरापा जिस्म में अब तू ही तू हैमकाँ हूँ मैं तू बाम-ओ-दर है मेरातू ख़द्द-ओ-ख़ाल है पैकर है मेराये तेरे इश्क़ का हर सू असर हैजमाल-ओ-रंग सब बेहतर है मेरावजूद अक्सर मैं अपना भूलता हूँभरम में तेरे ख़ुद को चूमता हूँतिरी वहशत में ही पाँव सुकूँ मैंतुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ मैं
फ़िराक़ सुब्हों की बुझती किरनेंविसाल शामों की जलती शमएँज़वाल ज़रदाब ख़ाल-ओ-ख़द से अटे ज़मानेये हाँफती धूप काँपती चाँदनी से चेहरेहैं मेरे एहसास का असासाबहार के बे-कनार मौसम में खिलने वालेतमाम फूलों से फूटते रंगवहशतों में घिरेलबों के खुले दरीचों से बहने वाले हुरूफ़ मेरी निशानियाँ हैं
कैसा सख़्त तूफ़ाँ थाकितनी तेज़ बारिश थीऔर मैं ऐसे मौसम मेंजाने क्यूँ भटकती थीवो सड़क के उस जानिबरौशनी के खम्बे से!सर लगाए इस्तादाआने वाले गाहक केइंतिज़ार में गुम थी!ख़ाल-ओ-ख़द की आराइशबह रही थी बारिश मेंतीर नोक-ए-मिज़्गाँ केमिल गए थे मिट्टी मेंगेसुओं की ख़ुश-रंगीउड़ रही थी झोंकों मेंमैं ने दिल में ये सोचाआब ओ बाद का रेला!उस को राख कर देगाये सजा बना चेहरा!क्या डरावना होगाफिर भी उस को ले जानाआने वाले गाहक काअपना हौसला होगा
मरहले झेल के निखरा है मज़ाक़-ए-तख़्लीक़सई-ए-पैहम ने दिए हैं ये ख़द-ओ-ख़ाल तुझेज़िंदगी चलती रही काँटों पे, अँगारों परजब मिली इतनी हसीं, इतनी सुबुक चाल तुझे
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