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नज़्म
जो फ़त्ह पाता तो शहर भर की सभी ख़ताएँ मु'आफ़ करता
जो क़त्ल करने को ढूँडते थे उन्हें बुला कर गले लगाता
शोएब कियानी
नज़्म
तुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीम
तुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कुछ तबले खड़कें रंग-भरे कुछ ऐश के दम मुँह-चंग भरे
कुछ घुंघरू ताल छनकते हों तब देख बहारें होली की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तेरी और मेरी ख़ताओं की सज़ा क्यूँ भुगतें
उन पे क्यूँ ज़ुल्म हो जिन की कोई तक़्सीर नहीं