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नज़्म
तुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीम
तुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदा
तो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मग़रिब के मोहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ ख़ाकी-वर्दी-पोश आए
इठलाते हुए मग़रूर आए लहराते हुए मदहोश आए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मिरे हमदम ये नख़लिस्तान इक दिन उस का मस्कन था
इसी के ख़र्रमी-ए-आग़ोश में उस का नशेमन था
अख़्तर शीरानी
नज़्म
है खटका उस के हाथ लगा जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है जो और किसी के दे झटका