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नज़्म
मुल्क हाथों से गया मिल्लत की आँखें खुल गईं
हक़ तिरा चश्मे 'अता कर दस्त-ए-ग़ाफ़िल दर निगर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये मजबूरी सी मजबूरी ये लाचारी सी लाचारी
कि उस के गीत भी दिल खोल कर मैं गा नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो माँ न जिस से लड़कपन के झूट बोल सका
न जिस के दिल के दराँ कुंजियों से खोल सका