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नज़्म
मैं वो हूँ जिस ने अपने ख़ून से मौसम खिलाए हैं
न-जाने वक़्त के कितने ही आलम आज़माए हैं
जौन एलिया
नज़्म
वो सब सामान मुहय्या हो और बाग़ खिला हो ख़्वाबों का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगीं
क़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
शहर-ए-तमन्ना के मरकज़ में लगा हुआ है मेला सा
खेल-खिलौनों का हर-सू है इक रंगीं गुलज़ार खिला
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जिस ज़मीं पर भी खिला मेरे लहू का परचम
लहलहाता है वहाँ अर्ज़-ए-फ़िलिस्तीं का अलम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जो और किसी का मान रखे तो उस को भी अरमान मिले
जो पान खिला दे पान मिले जो रोटी दे तो नान मिले
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
इक ख़्वाब की आहट से यूँ गूँज उठीं गलियाँ
अम्बर पे खिले तारे बाग़ों में हँसें कलियाँ
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
हैं खिले कियारियों में नर्गिस-ओ-नसरीन-ओ-समन
हौज़ फ़व्वारे हैं बंगलों में भी पर्दे चलवन