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नज़्म
जब चार निगाहें कर के कोई महव-ए-तबस्सुम होता है
जब कोई मोहब्बत का मारा उस कैफ़ में पड़ कर खोता है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
लौह-ए-तारीक पर आब-ए-महताब से इक कहानी के अंजाम में दो सिरों को मिलाते हुए
अपनी बीनाई खोता हुआ
अब्दुल्लाह साक़िब
नज़्म
मरीज़ अपनी कमाई अपनी दौलत मुफ़्त खोता है
ज़वाल-ए-तंदुरुस्ती ज़हर उस के हक़ में होता है
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ