aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khudaa"
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीजब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे सेसब बुत उठवाए जाएँगेहम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएँगेसब ताज उछाले जाएँगेसब तख़्त गिराए जाएँगेबस नाम रहेगा अल्लाह काजो ग़ाएब भी है हाज़िर भीजो मंज़र भी है नाज़िर भीउट्ठेगा अनल-हक़ का नाराजो मैं भी हूँ और तुम भी हो
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
पहले भी तो गुज़रे हैंदौर ना-रसाई के ''बे-रिया'' ख़ुदाई केफिर भी ये समझते हो हेच आरज़ू-मंदीये शब-ए-ज़बाँ-बंदी है रह-ए-ख़ुदा-वंदीतुम मगर ये क्या जानोलब अगर नहीं हिलते हाथ जाग उठते हैंहाथ जाग उठते हैं राह का निशाँ बन करनूर की ज़बाँ बन करहाथ बोल उठते हैं सुब्ह की अज़ाँ बन कररौशनी से डरते होरौशनी तो तुम भी हो रौशनी तो हम भी हैंरौशनी से डरते होशहर की फ़सीलों परदेव का जो साया था पाक हो गया आख़िररात का लिबादा भीचाक हो गया आख़िर ख़ाक हो गया आख़िरइज़्दिहाम-ए-इंसाँ से फ़र्द की नवा आईज़ात की सदा आईराह-ए-शौक़ में जैसे राह-रौ का ख़ूँ लपकेइक नया जुनूँ लपकेआदमी छलक उट्ठेआदमी हँसे देखो शहर फिर बसे देखोतुम अभी से डरते हो?हाँ अभी तो तुम भी होहाँ अभी तो हम भी हैंतुम अभी से डरते हो
कुछ ऐसा है ये मैं जो हूँ ये मैं अपने सिवा हूँ ''मैं''सो अपने आप में शायद नहीं वाक़े हुआ हूँ मैंजो होने में हो वो हर लम्हा अपना ग़ैर होता हैकि होने को तो होने से अजब कुछ बैर होता हैयूँही बस यूँही 'ज़ेनू' ने यकायक ख़ुद-कुशी कर लीअजब हिस्स-ए-ज़राफ़त के थे मालिक ये रवाक़ी भी
हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँक़लम बन गया है ख़ुदा की ज़बाँ
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा करनया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा करख़ुदा अगर दिल-ए-फ़ितरत-शनास दे तुझ कोसुकूत-ए-लाला-ओ-गुल से कलाम पैदा करउठा न शीशागरान-ए-फ़रंग के एहसाँसिफ़ाल-ए-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा करमैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समरमिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा करमिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी हैख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
ये वाक़िएहादसेतसादुमहर एक ग़मऔर हर इक मसर्रतहर इक अज़िय्यतहर एक लज़्ज़तहर इक तबस्सुमहर एक आँसूहर एक नग़्माहर एक ख़ुशबूवो ज़ख़्म का दर्द होकि वो लम्स का हो जादूख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँवो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचलतमाम एहसाससारे जज़्बेये जैसे पत्ते हैंबहते पानी की सतह परजैसे तैरते हैंअभी यहाँ हैंअभी वहाँ हैंऔर अब हैं ओझलदिखाई देता नहीं है लेकिनये कुछ तो हैजो कि बह रहा हैये कैसा दरिया हैकिन पहाड़ों से आ रहा हैये किस समुंदर को जा रहा हैये वक़्त क्या है
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमकभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम सेतो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझनाकि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारीहैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारीजो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँसजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारीनज़र से ज़माने की ख़ुद को बचानाकिसी और से देखो दिल मत लगानाकि मेरी अमानत हो तुमबहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराऔर इस पर ये काली घटाओं का पहरागुलाबों से नाज़ुक महकता बदन हैये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन हैबिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादलफ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागलवो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमजो बन के कली मुस्कुराती है अक्सरशब-ए-हिज्र में जो रुलाती है अक्सरजो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल देजो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल केछुपाना जो चाहें छुपाई न जाएभुलाना जो चाहें भुलाई न जाएवो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखनापत्थर को गुहर दीवार को दर कर्गस को हुमा क्या लिखनाइक हश्र बपा है घर में दम घुटता है गुम्बद-ए-बे-दर मेंइक शख़्स के हाथों मुद्दत से रुस्वा है वतन दुनिया-भर मेंऐ दीदा-वरो इस ज़िल्लत को क़िस्मत का लिखा क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारामुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारातौहीद की अमानत सीनों में है हमारेआसाँ नहीं मिटाना नाम-ओ-निशाँ हमारादुनिया के बुत-कदों में पहला वो घर ख़ुदा काहम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारातेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैंख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारामग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारीथमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमाराबातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमाराऐ गुलिस्तान-ए-उंदुलुस वो दिन हैं याद तुझ कोथा तेरी डालियों में जब आशियाँ हमाराऐ मौज-ए-दजला तू भी पहचानती है हम कोअब तक है तेरा दरिया अफ़्साना-ख़्वाँ हमाराऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हमहै ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारासालार-ए-कारवाँ है मीर-ए-हिजाज़ अपनाइस नाम से है बाक़ी आराम-ए-जाँ हमारा'इक़बाल' का तराना बाँग-ए-दरा है गोयाहोता है जादा-पैमा फिर कारवाँ हमारा
मिरी तलाश तिरी दिलकशी रहे बाक़ीख़ुदा करे कि ये दीवानगी रहे बाक़ी
उठ्ठो मिरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दोकाख़-ए-उमरा के दर ओ दीवार हिला दोगर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं सेकुन्जिश्क-ए-फ़रोमाया को शाहीं से लड़ा दोसुल्तानी-ए-जम्हूर का आता है ज़मानाजो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आए मिटा दोजिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ीउस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दोक्यूँ ख़ालिक़ ओ मख़्लूक़ में हाइल रहें पर्देपीरान-ए-कलीसा को कलीसा से उठा दोहक़ रा ब-सजूदे सनमाँ रा ब-तवाफ़ेबेहतर है चराग़-ए-हरम-ओ-दैर बुझा दोमैं ना-ख़ुश ओ बे-ज़ार हूँ मरमर की सिलों सेमेरे लिए मिट्टी का हरम और बना दोतहज़ीब-ए-नवी कारगह-ए-शीशागराँ हैआदाब-ए-जुनूँ शाइर-ए-मशरिक़ को सिखा दो
तिरे सोफ़े हैं अफ़रंगी तिरे क़ालीं हैं ईरानीलहू मुझ को रुलाती है जवानों की तन-आसानीइमारत किया शिकवा-ए-ख़ुसरवी भी हो तो क्या हासिलन ज़ोर-ए-हैदरी तुझ में न इस्तिग़ना-ए-सलमानीन ढूँड उस चीज़ को तहज़ीब-ए-हाज़िर की तजल्ली मेंकि पाया मैं ने इस्तिग़्ना में मेराज-ए-मुसलमानीउक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों मेंनज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों मेंन हो नौमीद नौमीदी ज़वाल-ए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ हैउमीद-ए-मर्द-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़-दानों मेंनहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद परतू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
आइए हाथ उठाएँ हम भीहम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहींहम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवाकोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं
वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहींतुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखनाअजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैंख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखनाहो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलामख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुमतुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दियामुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगेये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!तुझे सुब्ह बाज़ार में बूढ़े अत्तार यूसुफ़की दुक्कान पर मैं ने देखातो तेरी निगाहों में वो ताबनाकीथी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँजहां-ज़ाद नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!ये वो दौर था जिस में मैं नेकभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिबपलट कर न देखावो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतलेगिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँवो सर-गोशियों में ये कहतेहसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?वो हम से ख़ुद अपने अमल सेख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़राकि जैसे किसी शहर-ए-मदफ़ून पर वक़्त गुज़रेतग़ारों में मिट्टीकभी जिस की ख़ुश्बू से वारफ़्ता होता था मैंसंग-बस्ता पड़ी थीसुराही-ओ-मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस ओ गुल-दाँमिरी हेच-माया मईशत के इज़हार-ए-फ़न के सहारेशिकस्ता पड़े थेमैं ख़ुद मैं हसन कूज़ा-गर पा-ब-गिल ख़ाक-बर-सर बरहनासर-ए-चाक ज़ोलीदा-मू सर-ब-ज़ानूकिसी ग़म-ज़दा देवता की तरह वाहिमा केगिल-ओ-ला से ख़्वाबों के सय्याल कूज़े बनाता रहा थाजहाँ-ज़ाद नौ साल पहलेतू नादाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थीकि मैं ने हसन कूज़ा-गर नेतिरी क़ाफ़ की सी उफ़ुक़-ताब आँखोंमें देखी है वो ताबनाकीकि जिस से मेरे जिस्म ओ जाँ अब्र ओ महताब कारह-गुज़र बन गए थेजहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब-गूँ रातवो रूद-ए-दजला का साहिलवो कश्ती वो मल्लाह की बंद आँखेंकिसी ख़स्ता-जाँ रंज-बर कूज़ा-गर के लिएएक ही रात वो कुहरबा थीकि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वजूदउस की जाँ उस का पैकरमगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकलाहसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
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