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नज़्म
ख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दार
तुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मिरे बेटे उन्हें थोड़ी सी ख़ुद्दारी भी दे देना
जो हाकिम क़र्ज़ ले के इस को अपनी जीत कहते हैं
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
जज़्बा-ए-एहसास-ए-ख़ुद्दारी बशर में भर दिया
नाज़ उठाए हिन्द के वो हिन्द का ग़म-ख़्वार था
साहिर होशियारपुरी
नज़्म
ज़ोफ़ से आँखों के नीचे तितलियाँ फिरती हुई
औज-ए-ख़ुद्दारी से दिल पर बिजलियाँ गिरती हुई
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जल्वा-ए-हुस्न में शामिल थी निको-कारी भी
दर्द आया तिरे हिस्से में, तो ख़ुद्दारी भी
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
जोश-ए-इस्तिग़्ना तिरा तेरे लिए वजह-ए-नशात
शान-ए-ख़ुद्दारी तिरी आईना-दार-ए-एहतियात
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
उस की मिट्टी में हवा में आब में कोहसार में
शान-ए-ख़ुद्दारी का जल्वा देखने आया हूँ मैं
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
उभर आएगा ख़ुद्दारी का जज़्बा मुल्क वालों का
फ़क़त ईसार होगा मुद्दआ इन ख़ुश-ख़यालों का
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
सीना-ए-शाइर में पिन्हाँ जज़्बा-ए-ख़ुद्दार है
आँख भी रौशन है मेरी रूह भी बेदार है
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
जहाँ ईसार-ओ-ख़ुद्दारी के परचम लहलहाते थे
जहाँ मा'सूम बच्चे मौत से आँखें लड़ाते थे