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नज़्म
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
मर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मस्जिदों में सब जम्अ' हो जाएँगे ख़ुर्द-ओ-कलाँ
दूर हो दिल की कुदूरत ये सवाल-ए-ईद है
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
हर ख़ुर्द-ओ-कलाँ हर पीर-ओ-जवाँ है आज निदा-ए-आज़ादी
ये कोशिश सब पर लाज़िम है दाइम हो बक़ा-ए-आज़ादी
अर्श मलसियानी
नज़्म
चाँद की बज़्म में इंसाँ ने किया ख़ुर्द-ओ-नोश
इस ने ले जा के वहाँ अपना अलम रक्खा है
सलाम संदेलवी
नज़्म
लाला अनूप चंद आफ़्ताब पानीपति
नज़्म
वहीद अहमद
नज़्म
सोचता होगा कि हर ख़ुर्द-ओ-कलाँ चक्कर में है
ये ज़मीं चक्कर में है ये आसमाँ चक्कर में है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
कोरोना के दिनों में क्या हुआ था याद है तुम को
सभी अश्या-ए-ख़ुर्द-ओ-नोश को महफ़ूज़ करने को
अज़रा नाज़
नज़्म
मुड़ के देखा तो खड़ा है एक तिफ़्ल-ए-ख़ुर्द-साल
जिस की आँखों में तमन्ना जिस की नज़रों में सवाल