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नज़्म
ज़मीर-ओ-फ़िक्र-ए-इंसानी की आज़ादी का ख़्वाहाँ हूँ
मैं नस्ल-ओ-रंग-ओ-ख़ूँ के इमतियाज़ों से गुरेज़ाँ हूँ
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
ऐ जहाँ को बदलने के ख़्वाहाँ जवानो सुनो
वक़्त के चाक पर गीली मिट्टी के मानिंद है आदमी
ज़िया जालंधरी
नज़्म
तू है ख़्वाहान-ए-मसर्रत और मैं मग़्मूम हूँ
तुझ को हासिल इर्तिक़ा है और मैं मज़लूम हूँ
साक़िब कानपुरी
नज़्म
सर्द झोंकों में हवा के है लताफ़त और दिल
इस का ख़्वाहाँ है नहीं मिलने के जिस के आसार
अहमद अज़ीमाबादी
नज़्म
सर्द झोंकों में हवा के है लताफ़त और दिल
उस का ख़्वाहाँ है नहीं मिलने के जिस के आसार