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नज़्म
मिरे पिन-कुशन में बहुत सी पिनें हैं
और अक्सर पुणें इस में ऐसी हैं जो दूर अनजाने मुल्कों
परतव रोहिला
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
''बला-कशान-ए-मोहब्बत पे जो हुआ सो हुआ
जो मुझ पे गुज़री मत उस से कहो, हुआ सो हुआ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जिसे तुम पूछते रहते हो कब का मर चुका ज़ालिम
उसे ख़ुद अपने हाथों से कफ़न दे कर फ़रेबों का