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नज़्म
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुंतज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तीरा-ओ-तार ख़्वाहिश की संगलाख़ राहों पे चलते रहे
फिर भी राहों में कितने शगूफ़े खिले
मोहसिन नक़वी
नज़्म
कितने दिन हम और जिएँगे काम हैं कितने बाक़ी
कितने दुख हम काट चुके हैं और हैं कितने बाक़ी