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नज़्म
तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन
जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तीर-ए-इफ़्लास से कितनों के कलेजे हैं फ़िगार
कितने सीनों में है घुटती हुई आहों का ग़ुबार
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जिन हसीं लम्हों से हम बुनते हैं ख़ुशियाँ अपनी
इन में कितनों की तमन्नाओं का ख़ूँ बहता है
अली मीनाई
नज़्म
बचा पाया न मैं कितनों को सारी कोशिशों पर भी
रहे बीमार मुद्दत तक मिरे बातिन के बिस्तर पर
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
ज़िंदगी में मिल गए कितनों को सरकारी ख़िताब
मुफ़्त में इन को ख़रीदा मुफ़्त में बेचा गया
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
तू ने कितनों को नवाज़ा है करम से अपने
मैं तो रहती हूँ यहाँ सूरत-ए-अग़्यार फ़क़त