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नज़्म
किस की याद चमक उट्ठी है धुँदले ख़ाके हुए उजागर
यूँही चंद पुरानी क़ब्रें खोद रहा हूँ तन्हा बैठा
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मैं ने उस औरत का जिस्म बिसतर-बंद में लपेट दिया
बिसतर-बंद को रेलवे स्टेशन के माल-गोदाम में रखवा दिया
सय्यद सज्जाद
नज़्म
एक दूसरे को देख नहीं सकते
और क्या कहूँ कि इस साल देखने सुनने और बोलने पर भी नमकीं लगा दिया गया
सलीम फ़िगार
नज़्म
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात