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नज़्म
ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में
क़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!
कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मेख़ें ठोंकी गई हैं
घर से ले कर फ़ुटपाथ तक हमारा नहीं
सारा शगुफ़्ता
नज़्म
इस से बद-तर लत नहीं है कोई ये लत छोड़िए
रोज़ अख़बारों में छपता है कि रिश्वत छोड़िए
जोश मलीहाबादी
नज़्म
चुन लिया राह के रेज़ों को ख़ज़फ़-रेज़ों को
और समझ बैठे कि बस लाल-ओ-जवाहर हैं यही
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
न मिरा मकाँ ही बदल गया न तिरा पता कोई और है
मिरी राह फिर भी है मुख़्तलिफ़ तिरा रास्ता कोई और है
दिलावर फ़िगार
नज़्म
चार दिन जिस को किया झुक के ख़ुशामद से सलाम
वो भी ख़ुश हो गया अपना भी हुआ काम में काम