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नज़्म
फिर से उजड़ी दिल की बस्ती और हुई जग में रुस्वाई
फिर से कोसा मूरख मन को काहे झूटी आस लगाई
सदा अम्बालवी
नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ