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नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
गर फ़िक्र-ए-ज़ख्म की तो ख़ता-वार हैं कि हम
क्यूँ महव-ए-मद्ह-ए-खूबी-ए-तेग़-ए-अदा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मिरे बाज़ू पे जब वो ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ खोल देती थी
ज़माना निकहत-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं में डूब जाता था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
क्या कहूँ किस शौक़ से आया था तेरी बज़्म में
छोड़ कर ख़ुल्द-ए-अलीगढ़ की हज़ारों महफ़िलें
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमी
बने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्सा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जहाँ बरसाए जाते हों न कूड़े ज़ेहन-ए-इंसाँ पर
ख़यालों को जहाँ ज़ंजीर पहनाई न जाती हो