नई दुनिया

MORE BYराजेन्द्र नाथ रहबर

    दिल-ए-मजबूर तू मुझ को किसी ऐसी जगह ले चल

    जहाँ महबूब महबूबा से आज़ादाना मिलता हो

    किसी का नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ अपने हाथ में ले कर

    निकल सकता हो बे-खटके कोई सैर-ए-गुलिस्ताँ को

    निगाहों के जहाँ पहरे हों दिल के धड़कने पर

    जहाँ छीनी जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की

    जहाँ अरमाँ भरे दिल ख़ून के आँसू रोते हों

    जहाँ रौंदी जाती हो ख़ुशी अहल-ए-मोहब्बत की

    जहाँ जज़्बात अहल-ए-दिल के ठुकराए जाते हों

    जहाँ बाग़ी कहता हो कोई ख़ुद्दार इंसाँ को

    जहाँ बरसाए जाते हों कूड़े ज़ेहन-ए-इंसाँ पर

    ख़यालों को जहाँ ज़ंजीर पहनाई जाती हो

    कहाँ तक दिल-ए-नादाँ क़याम ऐसे गुलिस्ताँ में

    जहाँ बहता हो ख़ून-ए-गर्म-ए-इंसाँ शाह-राहों पर

    दरिंदों की जहाँ चाँदी हो ज़ालिम दनदनाते हों

    झपट पड़ते हों शाहीं जिस जगह कमज़ोर चिड़ियों पर

    दिल-ए-मजबूर तू मुझ को किसी ऐसी जगह ले चल

    जहाँ महबूब महबूबा से आज़ादाना मिलता हो

    स्रोत :
    • पुस्तक : Yad aaunga (पृष्ठ 136)

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