aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kundo.n"
तमाम कुन्दे (तू जानती है)जो सतह-ए-दरिया पे साथ दरिया के तैरते हैंये जानते हैं ये हादसेकि जिस से उन को,(किसी को) कोई मफ़र नहीं!तमाम कुन्दे जो सतह-ए-दरिया पे तैरते हैं,नहंग बनना ये उन की तक़दीर में नहीं है(नहंग की इब्तिदा में है इक नहंग शामिलनहंग का दिल नहंग का दिल!)न उन की तक़दीर में है फिर से दरख़्त बनना(दरख़्त की इब्तिदा में है इक दरख़्त शामिलदरख़्त का दिल दरख़्त का दिल!)तमाम कुंदों के सामने बंद वापसी कीतमाम राहेंवो सतह-ए-दरिया पे जब्रद-ए-दरिया से तैरते हैंअब उन का अंजाम घाट हैं जोसदा से आग़ोश वा किए हैंअब उन का अंजाम वो सफ़ीनेअभी नहीं जो सफ़ीना-गर के क़यास में भीअब उन का अंजामऐसे औराक़ जिन पे हर्फ़-ए-सियह छपेगाअब उन का अंजाम वो किताबेंकि जिन के क़ारी नहीं, न होंगेअब उन का अंजाम ऐसे सूरत-गरों के पर्देअभी नहीं जिन के कोई चेहरेकि उन पे आँसू के रंग उतरें,और इन में आइंदाउन के रूया के नक़्श भर देग़रीब कुंदों के सामने बंद वापसी कीतमाम राहेंबक़ा-ए-मौहूम के जो रस्ते खुले हैं अब तकहै उन के आगे गुमाँ का मुमकिनगुमाँ का मुमकिन जो तू है मैं हूँ!जो तू है में हूँ
अभी वो एक दिन का भी नहींभट्टी से मिट्टी की नस्ल आग का नाम पूछती औरगीली छाँव तले सो न न जाती तो क़ैदी क़ैदी न जनते कलियाँ खुलतीं या मौसम रहा होते या कुछ औरहोता मगर यूँ हुआ कि इस के मेरे दरमियाँ इक पल टूट गयाउस के मेरे दरमियाँ एक तितली भड़कती फिरती हैउस के मेरे दरमियाँ इक राह मुसाफ़िर हैउस के मेरे दरमियाँ बहुत से लफ़्ज़ टूटे हुए प्यालों के कुंडों की तरहएक दूसरे में अटके हुए हैंसो मैं ने आज का दिन भी ज़ाएअ' होने के लिए दीवार पर डाल दियाचुँधयाई हुई चिड़िया दर पर कव्वा किस के मज़ार की मिट्टी लिएमेरे आँगन में धूप धोने आ निकली हैउड़ने में कुछ देर लगेगीपर गीले हैं छतें ऊँची हैं दरमियाँ में धुआँधूप समेट और बिखेर रहा हैआओ मुझे रिहा करो मेरे परों से गीली मिट्टी चिमटी हुई हैमुझे उड़ने का इज़्न दो कि मैं ने सो रहने का गुनाह कियासूरज कमाने अब छाँव न होने देनामैं ने मरा हुआ झूट जना मुझे और सोने न देना कि अभी मुझे सच बोलना है
जब फ़स्ल कटी तो क्या देखाकुछ दर्द के टूटे गजरे थेकुछ ज़ख़्मी ख़्वाब थे काँटों परकुछ ख़ाकिस्तर से कजरे थेऔर दूर उफ़ुक़ के सागर मेंकुछ डोलते डूबते बजरे थे
चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारामुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारातौहीद की अमानत सीनों में है हमारेआसाँ नहीं मिटाना नाम-ओ-निशाँ हमारादुनिया के बुत-कदों में पहला वो घर ख़ुदा काहम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारातेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैंख़ंजर हिलाल का है क़ौमी निशाँ हमारामग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारीथमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमाराबातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हमसौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमाराऐ गुलिस्तान-ए-उंदुलुस वो दिन हैं याद तुझ कोथा तेरी डालियों में जब आशियाँ हमाराऐ मौज-ए-दजला तू भी पहचानती है हम कोअब तक है तेरा दरिया अफ़्साना-ख़्वाँ हमाराऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हमहै ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारासालार-ए-कारवाँ है मीर-ए-हिजाज़ अपनाइस नाम से है बाक़ी आराम-ए-जाँ हमारा'इक़बाल' का तराना बाँग-ए-दरा है गोयाहोता है जादा-पैमा फिर कारवाँ हमारा
पागल आँखों वाली लड़कीइतने महँगे ख़्वाब न देखोथक जाओगीकाँच से नाज़ुक ख़्वाब तुम्हारेटूट गए तोपछताओगीसोच का सारा उजला कुंदनज़ब्त की राख में घुल जाएगाकच्चे-पक्के रिश्तों की ख़ुश्बू का रेशमखुल जाएगातुम क्या जानोख़्वाब सफ़र की धूप के तेशेख़्वाब अधूरी रात का दोज़ख़ख़्वाब ख़यालों का पछतावाख़्वाबों की मंज़िल रुस्वाईख़्वाबों का हासिल तन्हाईतुम क्या जानोमहँगे ख़्वाब ख़रीदना हों तोआँखें बेचना पड़ती हैं यारिश्ते भूलना पड़ते हैं
या शायद इन ज़र्रों में कहींमोती है तुम्हारी इज़्ज़त कावो जिस से तुम्हारे इज्ज़ पे भीशमशाद-क़दों ने रश्क किया
''कड़ों में सोना नहीं है,उन पर सुनहरी पानी चढ़ा हुआ है''इक और ज़ेवर का ज़िक्र भी है:''वो नाक की नथ न बेचना तुमवो झूटा मोती है, तुम से सच्चा कहा था मैं ने,सुनार के पास जा के शर्मिंदगी सी होगी''
मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँतुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता थायहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी हैवहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था
ये सहरा भूक का सहरा हैये सहरा मौत का सहरा है3ये बच्चा कैसे बैठा हैये बच्चा कब से बैठा हैये बच्चा क्या कुछ पूछता हैये बच्चा क्या कुछ कहता हैये दुनिया कैसी दुनिया हैये दुनिया किस की दुनिया है4इस दुनिया के कुछ टुकड़ों मेंकहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा हैकहीं बादल घिर घिर आते हैंकहीं चश्मा है कहीं दरिया हैकहीं ऊँचे महल अटारीयाँ हैंकहीं महफ़िल है कहीं मेला हैकहीं कपड़ों के बाज़ार सजेये रेशम है ये दीबा हैकहीं ग़ल्ले के अम्बार लगेसब गेहूँ धान मुहय्या हैकहीं दौलत के संदूक़ भरेहाँ ताँबा सोना रूपा हैतुम जो माँगो सो हाज़िर हैतुम जो चाहो सो मिलता है
कितनी मेहनत से पढ़ाते हैं हमारे उस्तादहम को हर इल्म सिखाते हैं हमारे उस्तादतोड़ देते हैं जहालत के अँधेरों का तिलिस्मइल्म की शम्अ' जलाते हैं हमारे उस्तादमंज़िल-ए-इ'ल्म के हम लोग मुसाफ़िर हैं मगररास्ता हम को दिखाते हैं हमारे उस्तादज़िंदगी नाम है काँटों के सफ़र का लेकिनराह में फूल बिछाते हैं हमारे उस्ताददिल में हर लम्हा तरक़्क़ी की दुआ करते हैंहम को आगे ही बढ़ाते हैं हमारे उस्तादसब को तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का सबक़ देते हैंहम को इंसान बनाते हैं हमारे उस्तादहम को देते हैं ब-हर-लम्हा पयाम-ए-ता'लीमअच्छी बातें ही बताते हैं हमारे उस्तादख़ुद तो रहते हैं बहुत तंग-ओ-परेशान मगरदौलत-ए-इल्म लुटाते हैं हमारे उस्तादहम पे लाज़िम है कि हम लोग करें उन का अदबकिस मोहब्बत से बढ़ाते हैं हमारे उस्ताद
सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न मानेतेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुरानेअपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखाजंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा नेतंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ावाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़सानेपत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा हैख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है
किस सोच में गुम-सुम है तूऐ बे-ख़बर नादाँ न बनतेरी फ़सुर्दा रूह कोचाहत के काँटों की तलबऔर उस के दामन में फ़क़तहमदर्दियों के फूल हैं
जिस्म सौ बार जले तब भी वही मिट्टी हैरूह इक बार जलेगी तो वो कुंदन होगीरूह देखी है, कभी रूह को महसूस किया है?
ज़हे-क़िस्मत हिलाल-ए-ईद की सूरत नज़र आईजो थे रमज़ान के बीमार उन सब ने शिफ़ा पाईपहाड़ों से वो उतरे क़ाफ़िले रोज़ा-गुज़ारूँ केगया गरमी का 'मौसम और आए दिन बहारों केउठा होटल का 'पर्दा सामने पर्दा-नशीं आएजो छुप कर कर रहे थे एहतिराम-ए-हुक्म-ए-दीं आएहुई अँगूर की बेटी से ''मस्ती-ख़ान'' की शादीखुले दर मय-कदों के और मिली रिंदों को आज़ादीनवेद-ए-कामरानी ला रहे हैं रेस के घोड़ेमसर्रत के तराने गा रहे हैं रेस के घोड़ेमुबारक हो कि फिर से हो गया ''डांस'' और ''डिनर'' चालूख़लास अहल-ए-नज़र होंगे हुआ दर्द-ए-जिगर चालूनमाज़-ए-ईद पढ़ने के लिए सरकार आए हैंऔर उन के साथ सारे तालिब-ए-दीदार आए हैंयही दिन अहल-ए-दिल के वास्ते उम्मीद का दिन हैतुम्हारी दीद का दिन है हमारी ईद का दिन है
सेल्फ़ मेड लोगों का अलमियारौशनी मिज़ाजों का क्या अजब मुक़द्दर हैज़िंदगी के रस्ते में बिछने वाले काँटों कोराह से हटाने मेंएक एक तिनके से आशियाँ बनाने मेंख़ुशबुएँ पकड़ने में गुलिस्ताँ सजाने मेंउम्र काट देते हैंउम्र काट देते हैंऔर अपने हिस्से के फूल बाँट देते हैंकैसी कैसी ख़्वाहिश को क़त्ल करते जाते हैंदरगुज़र के गुलशन में अब्र बन के रहते हैंसब्र के समुंदर में कश्तियाँ चलाते हैंये नहीं कि उन को इस रोज़-ओ-शब की काहिश काकुछ सिला नहीं मिलतामरने वाली आसों का ख़ूँ-बहा नहीं मिलताज़िंदगी के दामन में जिस क़दर भी ख़ुशियाँ हैंसब ही हाथ आती हैंसब ही मिल भी जाती हैंवक़्त पर नहीं मिलतीं वक़्त पर नहीं आतींयानी उन को मेहनत का अज्र मिल तो जाता हैलेकिन इस तरह जैसेक़र्ज़ की रक़म कोई क़िस्त क़िस्त हो जाएअस्ल जो इबारत हो पस नविश्त हो जाएफ़स्ल-ए-गुल के आख़िर में फूल उन के खुलते हैंउन के सहन में सूरज देर में निकलते हैं
ज़रा उस ख़ुद अपने हीजज़्बों से मजबूर लड़की को देखोजो इक शाख़-ए-गुल की तरहअन-गिनत चाहतों के झकोलों की ज़द मेंउड़ी जा रही हैये लड़कीजो अपने ही फूल ऐसे कपड़ों से शरमातीआँचल समेटे निगाहें झुकाए चली जा रही हैजब अपने हसीं घर की दहलीज़ पर जा रुकेगीतो मुख मोड़ कर मुस्कुराएगी जैसेअभी उस ने इक घात में बैठेदिल को पसंद आने वालेशिकारी को धोका दिया है
कभी न खींचा शरारत से जिस का आँचल भीरचा सकी मिरी आँखों में जो न काजल भीवो माँ जो मेरे लिए तितलियाँ पकड़ न सकीजो भागते हुए बाज़ू मिरे जकड़ न सकीबढ़ाया प्यार कभी कर के प्यार में न कमीजो मुँह बना के किसी दिन न मुझ से रूठ सकीजो ये भी कह न सकी जा न बोलूँगी तुझ सेजो एक बार ख़फ़ा भी न हो सकी मुझ सेवो जिस को जूठा लगा मुँह कभी दिखा न सकाकसाफ़तों पे मिरी जिस को प्यार आ न सकाजो मिट्टी खाने पे मुझ को कभी न पीट सकीन हाथ थाम के मुझ को कभी घसीट सकीवो माँ जो गुफ़्तुगू की रौ में सुन के मेरी बड़कभी जो प्यार से मुझ को न कह सकी घामड़शरारतों से मिरी जो कभी उलझ न सकीहिमाक़तों का मिरी फ़ल्सफ़ा समझ न सकीवो माँ कभी जिसे चौंकाने को मैं लुक न सकामैं राह छेंकने को जिस के आगे रुक न सकाजो अपने हाथ से बहरूप मेरे भर न सकीजो अपनी आँखों को आईना मेरा कर न सकीगले में डाली न बाहोँ की फूल-माला भीन दिल में लौह-ए-जबीं से किया उजाला भीवो माँ कभी जो मुझे बद्धियाँ पहना न सकीकभी मुझे नए कपड़ों से जो सजा न सकीवो माँ न जिस से लड़कपन के झूट बोल सकान जिस के दिल के दराँ कुंजियों से खोल सकावो माँ मैं पैसे भी जिस के कभी चुरा न सकासज़ा से बचने को झूटी क़सम भी खा न सका
इक चमेली के मंडवे-तलेमय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ परदो बदनप्यार की आग में जल गएप्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदाप्यार उन की चितादो बदनओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुएजैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहरठंडी ठंडी सुबुक-रौ चमन की हवासर्फ़-ए-मातम हुईकाली काली लटों से लपट गर्म रुख़्सार परएक पल के लिए रुक गईहम ने देखा उन्हेंदिन में और रात मेंनूर-ओ-ज़ुल्मात मेंमस्जिदों के मनारों ने देखा उन्हेंमंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हेंमय-कदों की दराड़ों ने देखा उन्हेंअज़-अज़ल ता-अबदये बता चारा-गरतेरी ज़म्बील मेंनुस्ख़ा-ए-कीमीया-ए-मुहब्बत भी हैकुछ इलाज ओ मुदावा-ए-उल्फ़त भी हैइक चमेली के मंडवे-तलेमय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ परदो बदन
सारा दिन मैं ख़ून में लत-पत रहता हूँसारे दिन में सूख सूख के काला पड़ जाता है ख़ूनपपड़ी सी जम जाती हैखुरच खुरच के नाख़ूनों सेचमड़ी छिलने लगती हैनाक में ख़ून की कच्ची बूऔर कपड़ों पर कुछ काले काले चकते से रह जाते हैं
वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगेमर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगेये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगाइस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगामुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न देकाँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न देमुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बनेसीने में दहकते शोले हों हर साँस कोई आज़ार बनेऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेनाग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेनाहो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने काजो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने कालेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहींजो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहींतन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगेसौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगेइंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना हैऔरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है
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