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नज़्म
आँख से चंद आँसू टपक कर मेरे
कान को ढाँपते मेरे बालों की सूखी लटों को भिगोतें हुए कान में जा गिरे
कँवल मलिक
नज़्म
देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू'
बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू'
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सुख़न यानी लबों का फ़न सुख़न-वर यानी इक पुर-फ़न
सुख़न-वर ईज़द अच्छा था कि आदम या फिर अहरीमन
जौन एलिया
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस में
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा