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नज़्म
अर्श से फ़र्श पे करता है नुज़ूल
और उसी लम्हा वो बद-बख़्त वो मर्ताज़ी-ए-तस्बीह-ओ-रुकु-ओ-सज्दा
वहीद अख़्तर
नज़्म
वफ़ूर-ए-जोश-ए-सज्दा की न पूछो कार-फ़रमाई
जबीन-ए-शौक़ जुज़्व-ए-आस्ताँ मालूम होती है
नजमा तसद्दुक़
नज़्म
सर-ए-सज्दा झुकाया इस क़दर शौक़-ए-इबादत ने
जबीं मेरी तुम्हारा आस्ताँ मालूम होती है
राम लाल वर्मा हिंदी
नज़्म
मिरा शौक़-ए-सज्दा-रेज़ी है हनूज़ ना-मुकम्मल
मुझे कोई ये बता दे है कहाँ वो आस्ताना
राबिया सुलताना नाशाद
नज़्म
शौकत परदेसी
नज़्म
इक परस्तार-ए-अदब के लिए ऐ सज्दा-ए-शौक़
मस्जिद-ओ-मिम्बर-ओ-मेहराब है 'ग़ालिब' की ग़ज़ल