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नज़्म
इसी की आरज़ूओं की लहद में फेंक आया हूँ
मैं उस लड़के से कहता हूँ वो शोला मर चुका जिस ने
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
है लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंद
डालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इक मौत का धंदा बाक़ी है जब चाहेंगे निप्टा लेंगे
ये तेरा कफ़न वो मेरा कफ़न ये मेरी लहद वो तेरी है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
पस-ए-मर्ग ख़ाक हुए बदन वो कफ़न में हों कि हों बे-कफ़न
न मिरी लहद कोई और है न तिरी चिता कोई और है
दिलावर फ़िगार
नज़्म
लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की
मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
हमारे चेहरों पे जिन के बोसे जुड़े हुए हैं
वो आँखें अंधी लहद में शायद बिखर चुकी हों