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नज़्म
मुझ को पूछा था मुझे ढूँडा था चारों जानिब?
उस ने इक लम्हे को देखा मुझे और फिर हँस दी
परवीन शाकिर
नज़्म
है रन ये ज़िंदगी इक रन जो बरपा लम्हा लम्हा है
हमें इस रन में कुछ भी हो किसी जानिब तो होना है
जौन एलिया
नज़्म
ये भी पूछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ हो
जगमगाते हुए लम्हों से गुरेज़ाँ क्यूँ हो
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द