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नज़्म
जिन्हें कमसिनों ने चाहा कि लपक के प्यार कर लें
जिन्हें महवशों ने माँगा कि गले का हार कर लें
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये गीत मिस्ल-ए-शोला-ए-जव्वाला तुंद-ओ-तेज़
इस की लपक से बाद-ए-फ़ना का जिगर गुदाज़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये चाँदनी ये हवाएँ ये शाख़-ए-गुल की लचक
ये दौर-ए-बादा ये साज़-ए-ख़मोश फ़ितरत के
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दर्द की मुद्दत से अब दिल में चमक होती नहीं
वो तपक छालों की कौंदे की लपक होती नहीं