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नज़्म
जिन्हें कमसिनों ने चाहा कि लपक के प्यार कर लें
जिन्हें महवशों ने माँगा कि गले का हार कर लें
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये गीत मिस्ल-ए-शोला-ए-जव्वाला तुंद-ओ-तेज़
इस की लपक से बाद-ए-फ़ना का जिगर गुदाज़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये छब ये रूप ये जोबन ये सज ये धज ये लहक
चमकते तारों की किरनों की नर्म नर्म फुवार
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मय निकली जाम गुलाबी कुछ लहक लहक कुछ छलक छलक
हर चार तरफ़ ख़ुश-वक़्ती से दफ़ बाजे रंग और रंग होई
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दर्द की मुद्दत से अब दिल में चमक होती नहीं
वो तपक छालों की कौंदे की लपक होती नहीं