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नज़्म
टक ग़ाफ़िल दिल में सोच ज़रा है साथ लगा तेरे दुश्मन
क्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आसमाँ है आप का ख़ादिम तो लौंडी है ज़मीं
आप ख़ुद रिश्वत के ज़िम्मेदार हैं फ़िदवी नहीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
और कोई शे'र कह लेता है अच्छा भी अगर
कल का लौंडा कह के ख़ातिर में नहीं लाता हूँ मैं
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
जाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलन
सब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलन