aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "laundry"
कैसी निखरी सी नज़र आती है फ़ज़ा ईद के रोज़शादमाँ फिरते हैं सब शाह-ओ-गदा ईद के रोज़कितनी बे-फ़िक्री से गाते हैं गदा राहों मेंपेट ख़ाली हो तो गाएँ भी न क्या ईद के रोज़क्या भली लगती है हर पीर-ओ-जवाँ के मुँह सेहर तरफ़ ईद मुबारक की सदा ईद के रोज़अम्मी ख़ुश होंगी और ईदी भी वही पाएगावक़्त से पहले जो बेदार हुआ ईद के रोज़चाँद उनतीस को क्या निकला कि आधी शब सेटेलरिंग शाप में इक ताँता बँधा ईद के रोज़कपड़े भी धुल न सके वक़्त-ए-नमाज़ आ पहूँचालॉन्ड्री वालों पे आफ़त है बपा ईद के रोज़दादी अम्माँ ने मुसल्ले को परे डाल दियाघर में मेहमानों का वो शोर मचा ईद के रोज़आँख ओझल हुई और टूट सवैयों पे पड़ादेर से असलम इसी ताक में था ईद के रोज़ईद-गह शान से टम टम पे चले हैं बब्बनबाप के काँधों पे नन्हा भी चढ़ा ईद के रोज़पकड़े लाठी को मटकते चले रमज़ानी मियाँपीछे से बच्चों का इक गोल चला ईद के रोज़अपने बेगाने जो बढ़ बढ़ के गले मिलते होंक्यों न फिर आए इबादत में मज़ा ईद के रोज़रोज़े रमज़ान के रखना तो सभी भूल गएकैसे भूलेंगे सवैयों को भला ईद के रोज़साल के साल रहे याद-ए-ख़ुदा से ग़ाफ़िलऐ 'ज़की' उन को भी याद आया ख़ुदा ईद के रोज़
हर आन नफ़अ' और टोटे में क्यूँ मरता फिरता है बन बनटक ग़ाफ़िल दिल में सोच ज़रा है साथ लगा तेरे दुश्मनक्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलनक्या मंदर मस्जिद ताल कुआँ क्या खेती बाड़ी फूल चमनसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
(1)ऐ सब से अव्वल और आख़िरजहाँ-तहाँ, हाज़िर और नाज़िरऐ सब दानाओं से दानासारे तवानाओं से तवानाऐ बाला, हर बाला-तर सेचाँद से सूरज से अम्बर सेऐ समझे बूझे बिन सूझेजाने-पहचाने बिन बूझेसब से अनोखे सब से निरालेआँख से ओझल दिल के उजालेऐ अंधों की आँख के तारेऐ लंगड़े लूलों के सहारेनातियों से छोटों के नातीसाथियों से बिछड़ों के साथीनाव जहाँ की खेने वालेदुख में तसल्ली देने वालेजब अब तब तुझ सा नहीं कोईतुझ से हैं सब तुझ सा नहीं कोईजोत है तेरी जल और थल मेंबास है तेरी फूल और फल मेंहर दिल में है तेरा बसेरातू पास और घर दूर है तेराराह तिरी दुश्वार और सुकड़ीनाम तिरा रह-गीर की लकड़ीतू है ठिकाना मिस्कीनों कातू है सहारा ग़मगीनों कातू है अकेलों का रखवालातू है अँधेरे घर का उजालालागू अच्छे और बुरे काख़्वाहाँ खोटे और खरे काबेद निरासे बीमारों कागाहक मंदे बाज़ारों कासोच में दिल बहलाने वालेबिपता में याद आने वाले(2)ऐ बे-वारिस घरों के वारिसबे-बाज़ू बे-परों के वारिसबे-आसों की आस है तू हीजागते सोते पास है तू हीबस वाले हैं या बे-बस हैंतू नहीं जिन का वो बे-कस हैंसाथी जिन का ध्यान है तेरादुसरायत की वहाँ नहीं पर्वादिल में है जिन के तेरी बड़ाईगिनते हैं वो पर्बत को राईबेकस का ग़म-ख़्वार है तू हीबुरी बनी का यार है तू हीदुखिया दुखी यतीम और बेवातेरे ही हाथ उन सब का है खेवातू ही मरज़ दे तू ही दवा देतू ही दवा-दारू में शिफ़ा देतू ही पिलाए ज़हर के प्यालेतू ही फिर अमृत ज़हर में डालेतू ही दिलों में आग लगाएतू ही दिलों की लगी बुझाएचुम्कारे चुम्कार के मारेमारे मार के फिर चुम्कारेप्यार का तेरे पूछना क्या हैमार में भी इक तेरी मज़ा है(3)ऐ रहमत और हैबत वालेशफ़क़त और दबाग़त वालेऐ अटकल और ध्यान से बाहरजान से और पहचान से बाहरअक़्ल से कोई पा नहीं सकताभेद तिरे हुक्मों में हैं क्या क्याएक को तू ने शाद किया हैएक के दिल को दाग़ दिया हैउस से न तेरा प्यार कुछ ऐसाउस से न तू बेज़ार कुछ ऐसाहर दम तेरी आन नई हैजब देखो तब शान नई हैयहाँ पछुआ है वहाँ पुर्वा हैघर घर तेरा हुक्म नया हैफूल कहीं कुमलाए हुए हैंऔर कहीं फल आए हुए हैंखेती एक की है लहरातीएक का हर दम ख़ून सुखातीएक पड़े हैं धन को डुबोएएक हैं घोड़े बेच के सोएएक ने जब से होश सँभालारंज से उस को पड़ा न पालाएक ने इस जंजाल में आ करचैन न देखा आँख उठा करमेंह कहीं दौलत का है बरसताहै कोई पानी तक को तरसताएक को मरने तक नहीं देतेएक उकता गया लेते लेतेहाल ग़रज़ दुनिया का यही हैग़म पहले और ब'अद ख़ुशी हैरंज का है दुनिया के गिला क्यातोहफ़ा यही ले दे के है याँ कायहाँ नहीं बनती रंज सहे बिनरंज नहीं सब एक से लेकिनएक से यहाँ रंज एक है बालाएक से है दर्द एक निरालाघाव है गो नासूर की सूरतपर उसे क्या नासूर से निस्बततप वही दिक़ की शक्ल है लेकिनदिक़ नहीं रहती जान लिए बिनदिक़ हो वो या नासूर हो कुछ होदे न जो अब उम्मीद किसी कोरोज़ का ग़म क्यूँ-कर सहे कोईआस न जब बाक़ी रहे कोईतू ही कर इंसाफ़ ऐ मिरे मौलाकौन है जो बे-आस है जीतागो कि बहुत बंदे हैं पुर-अरमाँकम हैं मगर मायूस हैं जो याँख़्वाह दुखी है ख़्वाह सुखी हैजो है इक उम्मीद उस को बंधी हैखेतियाँ जिन की खड़ी हैं सूखीआस वो बाँधे बैठे हैं मेंह कीघटा जिन की असाड़ी में हैसावनी की उम्मीद नहीं हैडूब चुकी है उन की अगेतीदेती है ढारस उन को पछेतीएक है इस उम्मीद पे जीताअब हुई बेटी अब हुआ बेटाएक को जो औलाद मिली हैउस को उमंग शादियों की हैरंज है या क़िस्मत में ख़ुशी हैकुछ है मगर इक आस बंधी हैग़म नहीं उन को ग़मगीं हैंजो दिल ना-उमीद नहीं हैंकाल में कुछ सख़्ती नहीं ऐसीकाल में है जब आस समयँ कीसहल है मौजों से छुटकाराजब कि नज़र आता है किनारापर नहीं उठ सकती वो मुसीबतआएगी जिस के ब'अद न राहतशाद हो उस रह-गीर का क्या दिल?मर के कटेगी जिस की मंज़िलउन उजड़ों को कल पड़े क्यूँ-करघर न बसेगा जिन का जनम भरउन बिछड़ों का क्या है ठिकाना?जिन को न मिलने देगा ज़मानाअब ये बला टलती नहीं टालीमुझ पे है जो तक़दीर ने डालीआईं बहुत दुनिया में बहारेंऐश की घर घर पड़ीं पुकारेंपड़े बहुत बाग़ों में झूलेढाक बहुत जंगल में फूलेगईं और आएँ चाँदनी रातेंबरसीं खुलीं बहुत बरसातेंपर न खिली हरगिज़ न खिलेगीवो जो कली मुरझाई थी दिल कीआस ही का बस नाम है दुनियाजब न रही यही तो रहा क्या?ऐसे बिदेसी का नहीं ग़म कुछजिस को न हो मिलने की क़सम कुछरोना उन बन-बासियों का हैदेस निकाला जिन को मिला हैहुक्म से तेरे पर नहीं चाराकड़वी मीठी सब है गवाराज़ोर है क्या पत्ते का हवा परचाहे जिधर ले जाए उड़ा करतिनका इक और सात समुंदरजाए कहाँ मौजों से निकल करक़िस्मत ही में जब थी जुदाईफिर टलती किस तरह ये आई?आज की बिगड़ी हो तो बने भीअज़ल की बिगड़ी ख़ाक बनेगीतू जो चाहे वो नहीं टलताबंदे का याँ बस नहीं चलतामारे और न दे तू रोनेथपके और न दे तू सोनेठहरे बन आती है न भागेतेरी ज़बरदस्ती के आगेतुझ से कहीं गर भागना चाहेंबंद हैं चारों खूँट की राहेंतू मारे और ख़्वाह नवाज़ेपड़ी हुई हूँ मैं तेरे दरवाज़ेतुझ को अपना जानती हूँ मैंतुझ से नहीं तो किस से कहूँ मैंमाँ ही सदा बच्चे को मारेऔर बच्चा माँ माँ ही पुकारे(4)ऐ मिरे ज़ोर और क़ुदरत वालेहिकमत और हुकूमत वालेमैं लौंडी तेरी दुखयारीदरवाज़े की तेरी भिकारीमौत की ख़्वाहाँ जान की दुश्मनजान अपनी है आप अजीरनअपने पराए की धुत्कारीमैके और ससुराल पे भारीसह के बहुत आज़ार चली हूँदुनिया से बेज़ार चली हूँदिल पर मेरे दाग़ हैं जितनेमुँह में बोल नहीं हैं उतनेदुख दिल का कुछ कह नहीं सकतीइस के सिवा कुछ कह नहीं सकतीतुझ पे है रौशन सब दुख दिल कातुझ से हक़ीक़त अपनी कहूँ क्याब्याह के दम पाई थी न लेनेलेने के याँ पड़ गए देनेख़ुशी में भी दुख साथ न आयाग़म के सिवा कुछ हात न आयाएक ख़ुशी ने ग़म ये दिखाएएक हँसी ने गुल ही खिलाएकैसा था ये ब्याह निनावाँजूँही पड़ा इस का परछावाँचैन से रहने दिया न जी कोकर दिया मलियामेट ख़ुशी कोरो नहीं सकती तंग हूँ याँ तकऔर रोऊँ तो रोऊँ कहाँ तकहँस हँस दिल बहलाऊँ क्यूँ-करओसों प्यास बुझाऊँ क्यूँ-करएक का कुछ जीना नहीं होताएक न हँसता भला न रोतालेटे गर सोने के बहानेपाएनती कल है और न सिरहानेजागिये तो भी बन नहीं पड़तीजागने की आख़िर कोई हद भीअब कल हम को पड़ेगी मर करगोर है सूनी सेज से बेहतरबात से नफ़रत काम से वहशतटूटी आस और बुझी तबीअतआबादी जंगल का नमूनादुनिया सूनी और घर सूनादिन है भयानक और रात डरानीयूँ गुज़री सारी ये जवानीबहनें और बहनेलियाँ मेरीसाथ की जो थीं खेलियाँ मेरीमिल न सकीं जी खोल के मुझ सेख़ुश न हुईं हँस बोल के मुझ सेजब आईं रो-धो के गईं वोजब गईं बे-कल हो के गईं वोकोई नहीं दिल का बहलावाआ नहीं चुकता मेरा बुलावाआठ पहर का है ये जुलापाकाटूँगी किस तरह रँडापाथक गई दुख सहते सहतेथम गए आँसू बहते बहतेआग खुली दिल की न किसी परघुल गई जान अंदर ही अंदरदेख के चुप जाना न किसी नेजान को फूँका दिल की लगी नेदबी थी भोभल में चिंगारीली न किसी ने ख़बर हमारीक़ौम में वो ख़ुशियाँ बियाहों कीशहर में वो धोएँ साहों कीत्यौहारों का आए दिन आनाऔर सब का त्यौहार मनानावो चैत और फागुन की हवाएँवो सावन भादों की घटाएँवो गर्मी की चाँदनी रातेंवो अरमान भरी बरसातेंकिस से कहूँ किस तौर से काटेंख़ैर कटें जिस तौर से काटेंचाव के और ख़ुशियों के समय सबआते हैं ख़ुश कल जान को हो जबरंज में हैं सामान ख़ुशी केऔर जलाने वाले ही केघर बरखा और पिया बिदेसीआइयो बरखा कहीं न ऐसीदिन ये जवानी के कटे ऐसेबाग़ में पंछी क़ैद हो जैसेरुत गई सारी सर टकरातेउड़ न सके पर होते सारेकिसी ने होगी कुछ कल पाईमुझे तो शादी रास न आईआस बंधी लेकिन न मिला कुछफूल आया और फल न लगा कुछरह गया दे कर चाँद दिखाईचाँद हुआ पर ईद न आईफल की ख़ातिर बर्छी खाईफल न मिला और जान गँवाईरेत में ज़र्रे देख चमकतेदौड़ पड़ी में झील समझ केचारों खूँट नज़र दौड़ाईपर पानी की बूँद न पाई
आप हैं फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा-ए-पाक से कुर्सी-नशींइंतिज़ाम-ए-सल्तनत है आप के ज़ेर-ए-नगींआसमाँ है आप का ख़ादिम तो लौंडी है ज़मींआप ख़ुद रिश्वत के ज़िम्मेदार हैं फ़िदवी नहीं
मैं मुनाफ़िक़ हूँ हर इक का दोस्त बन जाता हूँ मैंदोस्त बन कर दोस्तों में फूट डलवाता हूँ मैंइंतिहा की चिड़ है मुझ को दो दिलों के क़ुर्ब सेदेखता हूँ जब ये फ़ौरन जाल फैलाता हूँ मैंमैं बुराई राम की करता हूँ जा कर शाम सेशाम ने जो कुछ कहा वो राम तक लाता हूँ मैंपीठ पीछे सब को देता हूँ मुग़ल्लज़ गालियाँसामने लेकिन अदब से सर के बल जाता हूँ मैंहल्क़ा-ए-अहल-ए-सुख़न में जो मिरी तौक़ीर हैछिन न जाए हर नए शाइ'र से घबराता हूँ मैंमुझ को अपनी शायरी पर किस तरह हो ए'तिमादख़ुद तो कम कहता हूँ औरों से कहलवाता हूँ मैंदाद देने के लिए रखता हूँ कुछ अहबाब साथशे'र उन के वास्ते भी माँग कर लाता हूँ मैंबज़्म में पढ़ता हूँ मैं नथुने फुला कर चीख़ करऔर इस से पेशतर तक़रीर फ़रमाता हूँ मैंये समझता हूँ कि कोई शे'र ख़ुद कहता नहींये ख़बर हर एक के बारे में फैलाता हूँ मैंऔर कोई शे'र कह लेता है अच्छा भी अगरकल का लौंडा कह के ख़ातिर में नहीं लाता हूँ मैंख़ुद तो ना-मौज़ूँ भी कह लेता हूँ मौज़ूँ भी मगरदूसरे के शे'र पर तन्क़ीद फ़रमाता हूँ मैंशायरी से वास्ता मुझ को न उर्दू से ग़रज़सिर्फ़ शोहरत के लिए उन से उलझ जाता हूँ मैंकुछ बुज़ुर्गों से मुझे भी क़ुर्ब हासिल था कभीनाम हो उन से मिरा यूँ उन के गुन गाता हूँ मैंज़िक्र करता हूँ पुरानी सोहबतों का बार बारऔर दौर-ए-हाल को माज़ी से ठुकराता हूँ मैंबावजूद इस के अगर होती नहीं शोहरत नसीबगालियाँ देता हूँ सब को बौखला जाता हूँ मैंजिस से मैं वाक़िफ़ हूँ वो शोहरत में आगे बढ़ गयादेख कर उस को बहुत कुढ़ता हूँ बल खाता हूँ मैंजानता ही कौन था मशहूर मैं ने कर दियाबस यही कह कह के अपने दिल को समझता हूँ मैंइल्म-ओ-फ़न की चंद बातें जो मुझे मालूम हैंदाद पाने के लिए हर बार दोहराता हूँ मैंदाद देनी हो तो यूँ देता हूँ इक इक लफ़्ज़ परलफ़्ज़ पूरा भी नहीं होता फड़क जाता हूँ मैंकुछ न थे अशआ'र मुँह देखे की दी थी मैं ने दादवक़्त-ए-ग़ीबत दाद की तरदीद फ़रमाता हूँ मैंजब किसी बज़्म-ए-सुख़न में शे'र पढ़ता है कोईइक तरफ़ बैठा हुआ तसहीह फ़रमाता हूँ मैंसाथ वालों पर यूँ करता हूँ फ़ज़ीलत आश्कारहो न हो हर शे'र में कुछ ऐब गिनवाता हूँ मैंया कभी फिर दाद देता हूँ ब-आवाज़-ए-दुहलसाथ वालों की तरफ़ फिर आँख मिचकाता हूँ मैंसामने जब तक रहूँ मैं हूँ ग़ुलामों का ग़ुलामआसमाँ से वर्ना तारे तोड़ कर लाता हूँ मैंजो नहीं लाते हैं ख़ातिर में ख़ुशामद को मिरीवो झिड़क देते हैं मुझ को उन से घबराता हूँ मैंया समझ जाते हैं जो इन मेरे हथकंडों का राज़सामने आते हुए उन के भी कतराता हूँ मैंकमतरी का है 'शिफ़ा' एहसास इन सब का सबबदुश्मनी औरों के दिल में तो नहीं पाता हूँ मैं
मेरी लिखने में उम्र गुज़री हैतेरी पढ़ने की उम्र है लड़कीतेरी सोचों की सब ख़बर है मुझेमुझ पे ये वक़्त आ के बीत चुकामैं भी ख़ुद से सवाल करता थाकिस की ग़ज़लों में किस के जल्वे हैंकिस का चेहरा है किस की नज़्मों मेंकौन रोता है किस के लहजे मेंकिस के शे'रों में किस की बातें हैंफिर जवाबात मिल गए मुझ कोअब हँसी आती है सवालों परऔर तुझ पर भी और ख़ुद पर भीतुझे मा'लूम क्या कि इक आमदकितने जज़्बों से हामिला हो करलेट कर एक बेसवा की तरहकोरे काग़ज़ के सर्द बिस्तर परवो हरामी कलाम जन्ती हैजिस पे फ़तवे फ़क़ीह-ए-शहर के हैंजो ख़ुदाओं को गाली लगता हैजिस पे रजअत-पसंद कुढ़ते हैंजिस पे जिद्दत-परस्त हँसते हैंजिस का ठट्ठा उड़ाते हैं लौंडेजिस के फ़न का ज़माना बीत गयाजिस से नफ़रत है इल्म वालों कोजिस पे ख़ुद मुझ को ग़ुस्सा आता हैजिसे तू भी समझ नहीं पातीनाम अपना खुरच के जिस पर सेमैं ने रद्दी में बारहा बेचाऔर सिगरेट ख़रीदे अपने लिएऔर इस दिल को आग में फूँकाजिस के जज़्बों से हामिला हो करकोरे काग़ज़ के सर्द बिस्तर परलेट कर एक बेसवा की तरहमेरी क़ुदरत की शाहकार आमदवो हरामी कलाम जन्नती हैतेरी सोचों की सब ख़बर है मुझेमेरे शे'रों में कौन है मत सोचतेरी पढ़ने की उम्र है लड़कीऔर फिर सोचने से क्या हासिलबारवर जुस्तुजू हुई भी तो क्यामेरी ग़ज़लों में तू हुई भी तो क्या
आप की लौंडी फ़साहत भी बलाग़त भी हुईरोज़-मर्रा से कलाम अपना सजाया क्या क्या
तसाहुल की चादर लपेटे हुए क़िस्सा-ख़्वानी इक शाम थीहम वहाँ अपनी दिन भर की इस जान-लेवा थकन सेनबर्द-आज़माख़ूब क़हवों पे क़हवे के प्याले लुंढाते रहेऔर अपने बुलंद-बाँग दावों से और क़हक़हों सेकहीं घोंसलों में छुपे थक के सोए हुएनीम-जाँ ताएरों को जगाते रहेऔर गुज़रे ज़माने के पीरों फ़क़ीरों की कोई न कई करामत सुनाते रहे(किस तरह साहिबान-ए-करामात बर्ज़ख़ तो बर्ज़ख़शर-अंगेज़ ज़िंदों की रूहें बुलाने पे क़ादिरसभी को बद-आमालियों से बचाते रहे)पर जो ये सब नहीं मानते थेवो निस्वार की तेज़ बू में बसेईंट गारे के इक नीम-पुख़्ता थड़े परबर-अफ़रोख़्ता हो के इंकार में सर हिलाते रहेहाँ मगर वो कि जिन के लबों परचरस और गाँजे की ऊदी सी तहमुस्तक़िल जम गई थीफ़क़त मुस्कुराते रहेऔर संगत में मौजूद जो ''बच्चा-ख़ुश'' थेवो हर आते जाते तरहदार कम-उम्र लड़के कोआँखों ही आँखों में पाते रहेफिर सब आपस में मिल करकराची से कुंदूज़ तक पेशा करती हुई कसबियोंहिजड़ों और लौंडों केपुर-कैफ़ क़िस्से सुनाते रहेगुदगुदाते रहेदिल लुभाते रहे
अपने बढ़ते हुए बालों को कटा लूँ तो चलूँग़ुस्ल-ख़ाने में ज़रा धूम मचा लूँ तो चलूँऔर एक केक मज़ेदार सा खा लूँ तो चलूँअभी चलता हूँ ज़रा प्यास बुझा लूँ तो चलूँरात में इक बड़ा दिलचस्प तमाशा देखामुझ से मत पूछ मिरे यार कि क्या क्या देखाठीक कहते हो मधुर सा कोई सपना देखाआँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँमैं थका-हारा था इतने में मदारी आयाउस ने कुछ पढ़ के मिरे सर को ज़रा सहलायामैं ने ख़ुद को किसी रंगीन महल में पायाऐसे दो-चार महल और बना लूँ तो चलूँजाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलनसब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलनमुझ को पीटा तो मिरा अश्कों से भीगा दामनअपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँमेरी आँखों में अभी तक है शरारत का ग़ुरूरअपनी दानाई का या'नी कि हिमाक़त का ग़ुरूरदोस्त कहते हैं इसे तो है ज़ेहानत का ग़ुरूरऐसे वहमों से अभी ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ
ज़िंदगी शेर का मौज़ूअ तो हो सकती हैशेर के और जो उनवाँ हैं अगर वो न रहेंइस पे क्या बहस करेंबहस फिर बहस हैऔरत पे हो लौंडे पे हो या जिंस पे होबहस फिर बहस हैअख़्लाक़ पर मज़हब पे हो या फ़ल्सफ़ा-ए-साइंस पे होबहस फिर बहस हैज़िंदगी और अजल पे हो या ख़ुद शेर पे होबहस किस दर्जा है ला-यानी शयबहस जो हो न सकी माँ से कि वो माँ है मिरीऔर बेटे से कि बेटा है मिराऔर नहीं जानते हम दोनों भीमैं भी बेटा भी मिराकिस की औलाद हैं हमबहस किस दर्जा है ला-यानी शयपूछो उस रूह से उस जिस्म से ख़ल्वत में कभीजो लफ़्ज़ सोचता रहता है यहीज़िंदगी किस तरह काटी जाए
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