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नज़्म
दिल तो चाहा पर शिकस्त-ए-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
फिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ में
ये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़फ़ा जब ज़िंदगी हो तो वो आ के थाम लेते हैं
रुला देती है जब दुनिया तो आ कर मुस्कुराते हैं
इरफ़ान अहमद मीर
नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को
गुलज़ार
नज़्म
बख़्शते हैं आप दरिया कश्तियाँ खेते हैं हम
आप देते हैं मवाक़े' रिश्वतें लेते हैं हम