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नज़्म
दरख़्तों की घनी छाँव में जा कर लेट जाता है
हवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैं
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
रुकी रुकी दिल-ए-फ़ितरत की धड़कनें यक-लख़्त
ये रंग-ए-शाम कि गर्दिश ही आसमाँ में नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
हाज़िरी अब कौन बोले कौन अब आएगा लेट
कॉलेज और स्कूल हैं सुनसान ख़ाली इन के गेट
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
चोर-बाज़ारी की मिट जाएगी हस्ती एक दिन
होगी शेवरलेट पे भी टू-लेट की तख़्ती एक दिन
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
दिल-बंद हम हैं तेरे लख़्त-ए-जिगर हैं तेरे
नख़्ल-ए-मुराद है तौ और हम समर हैं तेरे
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
अब ये आलम है कि जस कमरे में भी डालो नज़र
घर के हर कोने में हैं बिखरे होए लख़्त-ए-जिगर
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
जो शीर-ख़ार हैं हिन्दोस्ताँ के लख़्त-ए-जिगर
ये माँ के दूध से लिक्खा है उन के सीने पर