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नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कितना बेचैन उन्हें लेने को गँगा-जल था
जो भी धारा था उन्हीं के लिए वो बेकल था
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ
ख़ुद आँख से हम ने देखी है बातिल की शिकस्त-ए-फ़ाश यहाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
क्यूँ भी कहना जुर्म है कैसे भी कहना जुर्म है
साँस लेने की तो आज़ादी मयस्सर है मगर
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
पल-भर के लिए अपने कमरे को फ़ाइल लेने आता हूँ
और दिल में आग सुलगती है मैं भी जो कोई अफ़सर होता
मीराजी
नज़्म
भड़वे भी, भड़वा बकते हों तब देख बहारें होली की
और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवय्यों के लड़के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कितने ख़ुशी से बैठे खाते हैं ख़ुश महल में
कितने चले हैं लेने बनिए से क़र्ज़ पल में