aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "libaas-e-ma.aanii"
शिकस्त-ए-आहंग-ए-हर्फ़-ओ-मअ'नी के नौहागर हैं!
बे-नियाज़-ए-लिबास-ए-तख़मीनाथे ज्ञानी जो वो सफ़ेदे भी
रिश्ता-ए-लफ़्ज़-ओ-मा'नी की तज्दीद हो
क्या करूँ मैंबंद कर दूँ अपना बाब-ए-लफ़्ज़-ओ-मा'नी
निफ़ाक़ से ख़ुदा बचाए रोग ये ख़बीस हैलिबास-ए-जिस्म-ए-आदमी में कोढ़ है छुपा हुआ
लिबास-ए-अत्लस-ओ-दीबा में सरसराता हैये दामनों को पकड़ता है शाह-राहों में
ये फ़ल्सफ़ा-गर सदा-ओ-आहंग-ओ-हर्फ़-ओ-मा'नी को ज़ख़्म दे कर लहू का कच्चा खुरनड दाँतों से नोचते हैंगवाह रहना
कहीं ठंडी घनेरी घास पर, अपना लिबास-ए-ख़ाक-ओ-ख़ूँ रख करगुल-ए-मंज़र में खो जाए
तहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिसगिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा
हज़रत ने मिरे एक शनासा से ये पूछा'इक़बाल' कि है क़ुमरी-ए-शमशाद-ए-मआनी
दरिया-ए-तबी'अत को रवाँ हम ने किया हैदुर्र-ए-हा-ए-म'आनी को 'अयाँ हम ने किया है
ज़मीन-ए-हर्फ़-ओ-मा'नी से अभी कुछ ख़ार चुनने हैंख़यालों को धनक बनना है शायद
किसी ख़याल का पैकर किसी सनम का ख़यालहै क़हत-ए-लफ़्ज़-ओ-मआ'नी का मरहला दरपेश
जल्वा-ए-हुस्न-ए-मआ'नी से न सेंकी जब निगाहजब उरूस-ए-फ़िक्र की ख़ल्वत सजा सकते नहीं
(बहिश्त रख लो हमें ख़ुद अपना जवाब दे दो!)जिसे तमन्ना-ए-वस्ल-ए-म'अना
बे-लफ़्ज़-ओ-मअनी फ़क़त एक गूँज''सारी सच्चाइयाँ
लफ़्ज़-ओ-मा'नी मेंसंघर्ष जारी है
लफ़्ज़-ओ-मा'नीहमेशा से मेरे लिए
और दिन को वो सर-गश्ता-ए-इसरार-ओ-मआ'नीशहर-ए-हुनर-ओ-कू-ए-अदीबाँ में मिलेगा
ख़ूबसूरत ख़यालात की ताज़गीहुस्न-ए-अल्फ़ाज़-ओ-हुस्न-ए-मआ'नी के सब मो'तरिफ़
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