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नज़्म
वो माँ कि घुटनों से जिस के कभी लिपट न सका
वो माँ कि सीने से जिस के कभी चिमट न सका
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कभी मुस्कुराते हुए शोर करते हुए फिर गले से लिपट कर करो ऐसी बातें
हमें सरसराती हवा याद आए
मीराजी
नज़्म
मरमरीं ख़्वाबों की परियों से लिपट कर सो जाओ
अब्र पारों पे चलो, चाँद सितारों में उड़ो