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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
दिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोया
लिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तू ने लिख्खा था जला दूँ मैं तिरी तहरीरें
तू ने चाहा था जला दूँ मैं तिरी तस्वीरें
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
लिखा गया है बहुत लुतफ़-ए-वस्ल ओ दर्द-ए-फ़िराक़
मगर ये कैफ़ियत अपनी रक़म नहीं है कहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कि टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनी थीं कुछ जिस में
ये हर्फ़ थे जिन्हें मैं ने लिक्खा था पहले-पहल
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
लिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ा
छुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये मिरी उम्र का बे-मंज़िल ओ आराम सफ़र
क्या यही कुछ मिरी क़िस्मत में लिखा है तू ने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मैं ने इक पेड़ पे जो नाम लिखा था अपना
कुछ दिनों ज़ख़्म के मानिंद वो ताज़ा होगा