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नज़्म
तेरी रातों की सियाही में भी ऐ ज़ुल्मत-मआब
क्या कभी ताले हुआ है मुस्कुरा कर आफ़्ताब
जोश मलीहाबादी
नज़्म
मुझ से इज़्ज़त-दार डरते हैं मैं हूँ इज़्ज़त-मआब
''ईं कि मी बीनम ब बेदारीसत यारब या ब ख़्वाब''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
काश उर्दू ही में हो सारे दफ़ातिर का हिसाब
काश तक़रीरें करें उर्दू में सब इज़्ज़त-मआब
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल