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नज़्म
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
इश्क़ ही ज़िंदा ओ पाइंदा हक़ीक़त है 'जिगर'
इश्क़ को आम बना ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा कर
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
ख़ून-ए-दिल देना पड़ा ख़ून-ए-जिगर देना पड़ा
अपने ख़्वाबों की हसीं परछाइयाँ देना पड़ीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मैं ख़ुद हूँ आबला-पा कम-नसीब ख़ाक-बसर
है मेरी बज़्म फ़रोज़ाँ ब-फ़ैज़-ए-दाग़-ए-जिगर
बनो ताहिरा सईद
नज़्म
ज़िंदगी सिलसिला-ए-सोज़-ए-जिगर है ऐ दोस्त
आज आफ़ात से बेचैन बशर है ऐ दोस्त
अब्दुल क़य्यूम ज़की औरंगाबादी
नज़्म
ये वो बिजली थी तुझे जिस के असर ने फूँका
रफ़्ता रफ़्ता तपिश-ए-सोज़-ए-जिगर ने फूँका