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नज़्म
वो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब को
हवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जब नायक तन का निकल गया जो मुल्कों मुल्कों हांडा है
फिर हांडा है न भांडा है न हल्वा है न मांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
नवा-ए-सुब्ह हो या नाला-ए-शब कुछ भी गाना है
ज़फ़र-मंदों के आगे रिज़्क़ की तहसील की ख़ातिर