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नज़्म
पहाड़ मौज-ए-नसीम गेसु-ए-ख़लवती
सर-ए-ख़ुद-नेहादा ब-कफ़ ये मैं कि हुजूम-ए-मार-ए-सियाह मेरे अक़ब में है
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
मार ओ कजदुम के ठिकाने जिस की दीवारों के चाक
उफ़ ये रख़्ने किस क़दर तारीक कितने हौल-नाक
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
कि अब शहरों में मार ओ अज़दर ओ कर्गस नहीं मिलते
कुतुब-ख़ानों में अफ़्क़ार-ओ-अक़ाएद जल्वा-फ़रमा हैं
सहर अंसारी
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
देखो हर साल आएगी माह-ए-मई की ये यकुम
सुनते हैं सीधी नहीं होती कभी कुत्ते की दुम
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर