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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जन्नत-ए-शौक़ थी बेगाना-ए-आफ़ात-ए-सुमूम
दर्द जब दर्द न हो काविश-ए-दरमाँ मालूम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
मा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो दौर भी था जब दुनिया की हर शय पे जवानी छाई थी
ख़्वाबों की नशीली बद-मस्ती मासूम दिलों पर छाई थी
आमिर उस्मानी
नज़्म
जिसे दबाने के ब'अद उस को ग़द्र कहने लगे
ये अहल-ए-हिन्द भी होते हैं किस क़दर मासूम