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नज़्म
फिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूर
मायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूर
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
हम ने इस अहमक़ को आख़िर इसी तज़ब्ज़ुब में छोड़ा
और निकाली राह मफ़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
अर्श सिद्दीक़ी
नज़्म
ज़िंदगी तुझ से तवक़्क़ो तो बहुत थी लेकिन
तिरे फ़ैज़ान-ए-दिल-आवेज़ के दामन में मगर
अफ़ज़ल हुसैन अफ़ज़ल
नज़्म
अख़तर बस्तवी
नज़्म
एक जादू-ज़दा नीम-ख़्वाबीदा शहज़ादी-ए-ज़िंदगी की तरह मुंतज़िर है
यहाँ अपने होने से किस को मफ़र है