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नज़्म
तुम रूठ चुके दिल टूट चुका अब याद न आओ रहने दो
इस महफ़िल-ए-ग़म में आने की ज़हमत न उठाओ रहने दो
आमिर उस्मानी
नज़्म
जो साए दूर चराग़ों के गिर्द लर्ज़ां हैं
न जाने महफ़िल-ए-ग़म है कि बज़्म-ए-जाम-ओ-सुबू
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
महफ़िल-ए-शे'र-ओ-सुख़न दोस्तो बे-फ़ैज़ हुई
गुल करो शम'एँ चराग़ों की लवें ज़ख़्मी करो
जावेद अकरम फ़ारूक़ी
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल
इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
उठूँ उठ कर निज़ाम-ए-महफ़िल-ए-हस्ती बदल डालूँ
बढ़ूँ बढ़ कर बदी की क़ुव्वतों का सर कुचल डालूँ
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
रबाब-ए-इश्क़ हैं लर्ज़ां है इक तराना-ए-नाज़
जमी हुई है अभी महफ़िल-ए-शबाना-ए-नाज़
सय्यद आबिद अली आबिद
नज़्म
लाखों चीज़ें हैं हसीं महफ़िल-ए-दुनिया में मगर
ऐसी शय मिल नहीं सकती है कहीं से हम को
सलाम संदेलवी
नज़्म
अफ़्सुर्दा दाग़ से है तिरे महफ़िल-ए-अदब
ने वो सुरूर-ओ-सोज़ न जोश-ओ-ख़रोश है
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
एक ख़िज़्र-ए-अस्र-ए-हाज़िर इक कलीम-ए-अहद-ए-नौ
एक सद्र-ए-महफ़िल-ए-रुहानियाँ पैदा हुआ