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नज़्म
नहीं मैं महरम-ए-राज़-ए-दरून-ए-मय-कदा लेकिन
यही महसूस होता है कि हर शय कुछ दिगर-गूँ है
उबैदुर्रहमान आज़मी
नज़्म
इक मुकम्मल ज़िंदगी है शाइ'र-ए-शीरीं-बयाँ
महरम-ए-राज़-ए-फ़ना है और बक़ा का तर्जुमाँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
ख़त्म तुझ पर हो गया लुत्फ़-ए-बयान-ए-आशिक़ी
मर्हबा ऐ वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहान-ए-आशिक़ी
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
सिर्फ़ उसी की तर्जुमानी है तिरे अशआ'र में
जिस सुकूत-ए-राज़-ए-रंगीं को कहें जान-ए-हयात
नाज़िश प्रतापगढ़ी
नज़्म
थीं खुली जल्वा-गह-ए-ख़ास में राहें उन की
वाक़िफ़-ए-राज़-ए-हक़ीक़त थीं निगाहें उन की