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नज़्म
किन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-साल
देखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहाल
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
जहाँ की ज़मीं रश्क-ए-चर्ख़-ए-कुहन है
जहाँ शोख़ियाँ हैं अदा है फबन है
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
नश्शा-ए-नर्गिस-ए-ख़ूबान-ए-वतन तुम से है
इफ़्फ़त-ए-माह-ए-जबीनान-ए-वतन तुम से है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
साहब-ए-तर्ज़-ए-नेवी मालिक-ए-अंदाज़-ए-कुहन
फ़ख़्र-ए-दीं फ़ख़्र-ए-ज़मीं फ़ख़्र-ए-ज़माँ फ़ख़्र-ए-ज़मन
अर्श मलसियानी
नज़्म
ग़लग़ला तेरी सताइश का हो ता-चर्ख़-ए-कुहन
और तेरे जाँ-निसारों के हो लब पर ये सुख़न
सफ़ीर काकोरवी
नज़्म
अभी हर दुश्मन-ए-नज़्म-ए-कुहन के गीत गाना है
अभी हर लश्कर-ए-ज़ुल्मत-शिकन के गीत गाना है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
गरचे तुझ में अब नहीं वो जल्वा-ए-शान-ए-कुहन
वो हसीं तो है कि ऐ शम-ए-शबिस्तान-ए-कुहन